फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Jyoti Maurya Controversy And Manipur Violence Why women's Are Always Questioned

मीडिया का बदलता चरित्र और महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा

Mon, 24 Jul 2023 11:13 AM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Mon, 24 Jul 2023 11:13 AM IST
सार

हमारे समाज में महिलाओं के साथ हिंसा, बलात्कार की बहुत सी अनगिनत घटनाएं प्रतिदिन घटती है। हम स्वयं भी उस हिंसा को बढ़ावा देते हैं और फिर यह हिंसा एक वर्ग विशेष के प्रति आक्रामक रूप धारण कर लेती है। उसके सम्मान व जीने के अधिकार का हनन करती है।

विज्ञापन
Jyoti Maurya Controversy And Manipur Violence Why women's Are Always Questioned
समाज के सवालों पर क्यों खड़ी की जाती रही हैं महिलाएं - फोटो : Pixabay

विस्तार

वर्तमान समय में मीडिया का चरित्र दोहरा होता जा रहा है। यह चरित्र सामाजिक न्याय का पैरोकार होने की अपेक्षा राजनीतिक व आर्थिक हित के अनुरूप अपना चरित्र बदल रहा है। चरित्र बदलने व दोहरे चरित्र के साथ काम करने की मानसिकता आज मीडिया में देखी जा रही है। मीडिया अनावश्यक खबरों को आवश्यक बनाता हुआ दिन-भर उस पर बहस को चलाता है और व्यक्तिगत व गैर जरूरी मुद्दों को बहस का केंद्र बना देता है।

विज्ञापन


इसका ताजा उदाहरण ज्योति मोर्य व सीमा हैदर है। जिनका प्रेम व संबंध विच्छेद मीडिया की सुर्खियां बटोर रहा है और टीवी न्यूज चैनलों में बहस का केंद्र बना हुआ है। हम उन खबरों को सुन भी रहें हैं और उनके आधार पर निर्णय भी सुना रहे हैं। दो महिलाओं के व्यक्तिगत निर्णय के आधार पर संपूर्ण महिला समाज को कटघरें पर खड़ा कर रहे हैं। महिलाओं पर व्यक्तिगत आक्षेप से लेकर सार्वजनिक टिप्पणी कर रहे हैं। कोई उनकी शिक्षा व रहन-सहन पर सवाल कर रहा है तो कोई समाज में उन्हें कैसे रहना चाहिए? इसका ज्ञान दे रहा है। 
विज्ञापन


इन सब के मध्य जो आवश्यक घटनाएं हैं जो मीडिया के बहस का केंद्र होनी चाहिए थी। वह मीडिया में खबर बनने की आकांक्षा में दम तोड़ देती हैं। यही कारण है कि मीडिया धीरे-धीरे अपना विश्वास व जनमत खोता जा रहा है। हाल ही में मणिपुर से सोशल मीडिया में जारी एक वीडियो ने हमें समाज की मन स्थिति को पुन: समझने के लिए मजबूर कर दिया। जाति व धर्म के नाम पर महिलाओं के साथ यौन हिंसा व हिंसा बढ़ रही है। एक वर्ग विशेष जहां महिला के साथ हिंसा व सार्वजनिक रूप से उसे निर्वस्त्र करके घुमा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


वहीं एक वर्ग दर्शक बनकर वीडियो बना रहा है। हम ऐसे समाज में पहुंच रहे हैं जहां मानवता समाप्त हो रही है। हमें इंसान के जीवन से अधिक इंस्टा, फेसबुक की सुर्खियां, लाइक, कमेंट और सब्सक्राइब अच्छे लगने लगे हैं। इसी प्रकार से दिल्ली में एक लड़की के साथ हिंसा की घटना भी मीडिया में खबर बनी थी और कुछ दिन बहस होने के बाद शांत हो गई थी। यह खबर बेशक मीडिया में पुरानी होकर दरकिनार हो गई थी लेकिन हमारे समाज में महिलाओं के बीच ये आज भी बहस और चर्चा का केंद्र है। सार्वजनिक स्थल पर एक लड़की की सरेआम हत्या की जा रही है और लोगो द्वारा कोई प्रतिक्रिया दिए बिना वहां से चले जाना। 

Jyoti Maurya Controversy And Manipur Violence Why women's Are Always Questioned
समाज के सवालों पर क्यों खड़ी की जाती रही हैं महिलाएं - फोटो : सोशल मीडिया

ऐसे में हत्यारें से अधिक अपराधी तो वह दर्शक हैं जो अपराध को होता देखकर भी मौन रहे। इसी तरह कहीं भाई अपनी बहन का सिर काट रहा है तो कहीं पति गुस्से में पत्नी के टुकड़े कर रहा है तो कहीं महिलाएं परिवार, समाज से लेकर कार्यस्थलों तक में यौन शोषण का शिकार हो रही हैं।

इस तरह की घटनाएं हमारे समाज के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के लिए भी शर्मनाक है। जब हम अपने ही समाज में महिलाओं के प्रति हत्या, हिंसा और बलात्कार को रोक नहीं पा रहे बल्कि इन अपराधिक घटनाओं में उनके सहयोगी बन रहे हैं और उन घटनाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन करके उनके सही होने का उपक्रम कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ हम अपने ‘राष्ट्र’ को ‘माता’ शब्द के रूप से संबोधित करते हैं। ऐसे में क्या हम उस शब्द से जुड़े स्त्री सम्मान व मातृत्व भाव का सम्मान कर पा रहे हैं! 

हमारे समाज में महिलाओं के साथ हिंसा, बलात्कार की बहुत सी अनगिनत घटनाएं प्रतिदिन घटती है। हम स्वयं भी उस हिंसा को बढ़ावा देते हैं और फिर यह हिंसा एक वर्ग विशेष के प्रति आक्रामक रूप धारण कर लेती है। उसके सम्मान व जीने के अधिकार का हनन करती है।

महिलाओं के प्रति हिंसा प्रत्येक देशकाल में होती रही है। यह हिंसा स्त्री को निर्वस्त्र ही नहीं करती बल्कि उसके सम्मान के साथ ही राष्ट्र के सम्मान को भी कटघरे में खड़ा करती है। यहां ‘स्त्री’ का अस्तित्व ही फिर एक प्रश्न बनकर रह जाता है। फिर वह रामायण की सीता हो, महाभारत की द्रोपदी हो या आज की महिलाएं। जो सत्ता, समाज के सवालों पर सदैव ही कटघरे में खड़ी की जाती रही हैं। 

कभी अग्नि परीक्षा देने को मजबूर होती हैं और हम उसे सतीत्व से जोड़कर महिमामंडित करते हैं तो कहीं अपने अहं में जुए पर पत्नी को दाव पर लगाते पतियों के कारण सभा में निर्वस्त्र की जाती है और सभा में राजा से लेकर प्रजा सभी मौन दर्शक बनते हैं। समय, देशकाल वातावरण सभी कुछ बदला है जो नहीं बदला है, वह हमारी मन: स्थिति है।

आज वैवाहिक संबंधों से इत्तर प्रेम प्रसंगों में लिप्त पुरुषों से अधिक महिलाओं के प्रसंग मीडिया में बहस का हिस्सा बन रहे हैं लेकिन इन सब के बीच महिलाओं के साथ वीभत्स रूप से घटित हिंसा व बलात्कार की घटनाओं में धर्म से लेकर जाति तक पर तो चर्चा की जाती है लेकिन वीभत्स रूप से हिंसा व हत्या के पीछे स्त्री के प्रति वीभत्स मानसिकता बहस के केंद्र में नहीं आती है। यही कारण हैं कि महिलाओं के प्रति हिंसा और बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं।

सत्ता, समाज के सवालों पर सदैव ही महिलाएं कटघरे में खड़ी की जाती रही हैं। कभी अपनों के ही द्वारा अग्नि परीक्षा देती हैं तो कभी सरे आम निर्वस्त्र की जाती हैं। उस समय में भी समाज संवेदन शून्य था और आज भी शून्य है। यह मानवीय शून्यता समाज के अस्तित्व को धीरे-धीरे समाप्त कर रही है साथ ही स्त्री-पुरुष संबंधों के मध्य अविश्वास को भी बढ़ावा दे रही है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed