रक्षाबंधन: रक्षा केवल कलाई पर बांधे गए धागे से नहीं, होती है प्रेम और भरोसे से
रक्षाबंधन को लेकर हमारे यहां कई कथाएं सुनाई जाती हैं। अलग-अलग जगहों पर इनके रूप भी अलग मिलते हैं, लेकिन इन सभी में एक बात समान है, रक्षा और अपनापन। सबसे पुरानी कथाओं में इंद्र और इंद्राणी की कथा का उल्लेख मिलता है। देवताओं और असुरों के युद्ध के समय इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। उन्होंने इंद्र की जीत और सुरक्षा की कामना की।
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रक्षाबंधन देखने में यह बहुत सरल त्योहार है, लेकिन इसके पीछे की भावना काफी बड़ी है। राखी का मतलब सिर्फ इतना नहीं कि भाई अपनी बहन की रक्षा करेगा। असल बात यह है कि भाई-बहन एक-दूसरे के सुख-दु:ख में साथ खड़े रहेंगे। शायद यही वजह है कि इतने पुराने समय से चला आ रहा यह त्योहार आज भी हमारे जीवन का हिस्सा बना हुआ है।
दरअसल, सनातन परंपरा में त्योहार सिर्फ पूजा और रीति-रिवाज के लिए नहीं होते। उनके पीछे कोई न कोई जीवन संदेश भी होता है। रक्षाबंधन का संदेश अपने लोगों के लिए खड़े रहना और अपने रिश्तों को निभाना है।
रक्षाबंधन को लेकर हमारे यहां कई कथाएं सुनाई जाती हैं। अलग-अलग जगहों पर इनके रूप भी अलग मिलते हैं, लेकिन इन सभी में एक बात समान है, रक्षा और अपनापन। सबसे पुरानी कथाओं में इंद्र और इंद्राणी की कथा का उल्लेख मिलता है। देवताओं और असुरों के युद्ध के समय इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। उन्होंने इंद्र की जीत और सुरक्षा की कामना की।
इस कथा से यह समझ आता है कि रक्षा का भाव केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं था। संकट में अपने व्यक्ति के साथ खड़े होना भी रक्षा ही है।
दूसरी लोकप्रिय कथा राजा बलि और लक्ष्मी से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान विष्णु राजा बलि को दिए वचन के कारण उनके साथ थे। तब माता लक्ष्मी ने बलि को राखी बांधी और उन्हें अपना भाई माना। बलि ने भी भाई का रिश्ता स्वीकार किया। इस कथा की सबसे अच्छी बात यही है कि रिश्ता केवल खून का नहीं होता। विश्वास और अपनापन भी रिश्ते बना सकते हैं।
राखी बांधते समय पढ़ा जाने वाला मंत्र भी इसी भावना को बताता है,
“येन बद्धो बलि राजा
दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि
रक्षे मा चल मा चल॥”
अर्थात जिस रक्षा सूत्र से राजा बलि को बांधा गया था, उसी तरह मैं तुम्हें बांध रहा या रही हूं। हे रक्षा सूत्र, अपने संकल्प से कभी पीछे मत हटना। कितनी छोटी-सी बात है, लेकिन संदेश बहुत बड़ा है। राखी सिर्फ धागा नहीं है, एक वादा है।
तीसरी कथा श्रीकृष्ण और द्रौपदी की है। यह कथा हमारे समाज में बहुत लोकप्रिय है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपने कपड़े का टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। बाद में जब द्रौपदी संकट में थी, तब श्रीकृष्ण ने उसकी मदद की। महाभारत में इसे रक्षाबंधन की सीधी कथा के रूप में नहीं मिलता, लेकिन लोक परंपरा में यह कहानी भाई-बहन के स्नेह और एक-दूसरे के लिए खड़े होने का उदाहरण बन गई।
चौथी कथा यमराज और यमुना की है। मान्यता है कि यमुना ने अपने भाई यमराज का स्वागत किया और उनके हाथ पर रक्षा सूत्र बांधा। यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वरदान दिया। इस कथा में भी सीधा संदेश है, रिश्ते तभी मजबूत रहते हैं, जब हम उन्हें समय देते हैं।
आज हमारे पास एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए मोबाइल है, इंटरनेट है और सोशल मीडिया है, लेकिन इसके बावजूद परिवारों में पहले जैसी बातचीत कम होती जा रही है। भाई दूसरे शहर में है। बहन किसी दूसरे देश में है। माता-पिता अपने काम में व्यस्त हैं। बच्चे अपने मोबाइल में। ऐसे समय में रक्षाबंधन एक बहाना ही सही, लेकिन परिवार को फिर से साथ बैठाता है।
आज भाई का मतलब केवल बहन की रक्षा करने वाला व्यक्ति मानना भी ठीक नहीं होगा। आज की बहन आत्मनिर्भर है। वह पढ़ती है, नौकरी करती है, कारोबार करती है और अपने फैसले खुद लेती है। इसलिए आज भाई की जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि वह बहन की सुरक्षा के साथ-साथ उसके सम्मान, अधिकार और अपने फैसले लेने की आजादी का भी सम्मान करे।
बहन भी भाई के लिए वही करे। भाई को भी जीवन में परेशानी होती है। उसे भी किसी अपने की जरूरत पड़ती है। इसलिए रक्षाबंधन का रिश्ता एकतरफा नहीं, दोनों तरफ का होना चाहिए।
सनातन धर्म में रक्षा का अर्थ बड़ा है। हम अक्सर रक्षा शब्द को केवल सुरक्षा के अर्थ में लेते हैं। लेकिन सनातन परंपरा में इसका अर्थ इससे कहीं बड़ा है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं,
“परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे॥”
अर्थात, जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब सज्जनों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए भगवान का अवतार होता है। रक्षाबंधन को इसी सोच से जोड़कर देखें तो बात केवल भाई और बहन की नहीं रह जाती।
हमें अपने परिवार की रक्षा करनी है। अपने बच्चों के संस्कारों की रक्षा करनी है। बुजुर्ग माता-पिता का ध्यान रखना है। बेटियों को सुरक्षित माहौल देना है। प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करनी है। सबसे बड़ी बात, अपने समाज में भरोसा और इंसानियत बचाए रखनी है।
आज राखियां बाजार में हर तरह की मिलती हैं। ऑनलाइन भी भेजी जा सकती हैं। भाई के लिए उपहार भी घर बैठे पहुंच जाता है, लेकिन रक्षाबंधन की असली परीक्षा उस दिन होती है, जब बहन को सचमुच भाई की जरूरत हो। भाई के लिए भी यही बात है।
यदि भाई किसी परेशानी में है, तो बहन उसके साथ खड़ी हो। अगर वह असफल हो गया है, परेशान है या किसी मुश्किल से गुजर रहा है तो उसे यह महसूस होना चाहिए कि उसकी बहन उसके साथ है। यही रिश्ते की असली ताकत है।
इसलिए इस रक्षाबंधन पर मात्र राखी बांधने की रस्म न निभाएं। एक-दूसरे के लिए थोड़ा समय निकालें। बैठकर बात करें। पुरानी यादें साझा करें। माता-पिता के साथ कुछ समय बिताएं। हो सके तो एक छोटा-सा संकल्प लें। हम एक-दूसरे का साथ सिर्फ अच्छे दिनों में नहीं, बुरे दिनों में भी देंगे।
आखिर राखी का धागा बहुत कमजोर होता है। वह आसानी से टूट सकता है, लेकिन उस धागे में बंधा विश्वास मजबूत हो तो रिश्ता सालों-साल चलता है। रक्षाबंधन का असली संदेश शायद यही है, रक्षा केवल कलाई पर बांधे गए धागे से नहीं होती। रक्षा प्रेम से होती है, भरोसे से होती है और जरूरत के समय एक-दूसरे के साथ खड़े होने से होती है।
इसलिए रक्षाबंधन आज भी जरूरी है, बल्कि जिस तेजी से जीवन बदल रहा है और रिश्तों के लिए समय कम होता जा रहा है, उस दौर में इसकी जरूरत शायद पहले से कहीं ज्यादा है। राखी उतार दी जाएगी, धागा टूट जाएगा, लेकिन अगर रिश्ते का भरोसा मन में बंध गया तो वह कभी नहीं टूटेगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।