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अपने ही घर में इस बड़ी मुसीबत से घिरा चीन, अमेरिका को लेकर टेंशन में हैं जिनपिंग

Sat, 05 Jan 2019 04:15 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Sat, 05 Jan 2019 04:15 PM IST
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china and taiwan conflict america and republic of china
रिपब्लिक ऑफ चाइना को ताइवान कहा जाता है। - फोटो : File Photo

दो चीन आमने सामने। अपने को असली चीन बताते हुए। एक का नाम रिपब्लिक ऑफ चाइना और दूसरे का नाम पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना।रिपब्लिक ऑफ चाइना को हम आज ताइवान कहते हैं। मगर हक़ीक़त है कि दोनों देश अपने को असल चाइना बता रहे हैं। एक दूसरे से लड़ रहे हैं।दोनों एक दूसरे को मान्यता भी नहीं देते। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को हिन्दुस्तान में हम चीन कहते हैं। अब यही चीन गुर्रा रहा है।

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दूसरे चीन याने रिपब्लिक ऑफ चाइना याने ताइवान को धमका रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी ज़िन पिंग ने बुधवार को अपने ताज़े भाषण में साफ़-साफ़ कहा है कि ताइवान चीन में अपना विलय करे। उन्होंने लालच दिया है  कि ताइवान के लिए एक देश - दो स्वतंत्र शासन प्रणालियां लागू की जा सकती हैं। हालांकि उन्होंने चेतावनी भी दी कि सैनिक कार्रवाई का दरवाज़ा खुला है। शी ज़िन पिंग ने अन्य देशों को भी आग़ाह किया है कि वे उसके अंदरूनी मामले में दखल न दें। चीनी राष्ट्रपति का इशारा अमेरिका की तरफ़ है।
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इससे एक बार फिर इलाक़े की हवा में तनाव की लहरें दिख रही हैं। फ़िलहाल ताइवान पर इसका असर होता नहीं दिखता। इस छोटे से द्वीप की महिला राष्ट्रपति साईं इंग वेन ने चीन की घुड़की का करारा उत्तर दिया है। उन्होंने कहा कि चीन की मौजूदा शर्तों पर दोनों मुल्क़ों का विलय अथवा एकीकरण नहीं हो सकता। चीन ताइवान की संप्रभुता को माने और शान्तिपूर्वक ढंग से मतभेदों को सुलझाए। दरअसल इन दोनों देशों के बीच विवाद की जड़ें गहरी हैं। समझने के लिए इतिहास के कुछ पुराने पन्ने पलटने होंगे।
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दोनों ही देश अपने-अपने को असली चीन बता रहे हैं और झगड़ रहे हैं। - फोटो : File Photo

क्या है चीन और ताइवान की कहानी 
बहुत संक्षेप में बयान करता हूं। कहानी शुरू होती है क़रीब सवा सौ साल पहले। सन् 1894 में जापान ने चीन का एक सैनिक जहाज़ पानी में डुबो दिया। चीन ने तब जापान पर हमला कर दिया। जंग नौ महीने चली। चीन की शर्मनाक हार हुई। उसे 20 करोड़ सिक्के और अनेक द्वीप जापान को सौंपने पड़े।इनमें एक द्वीप फॉरमोसा था। यही फॉरमोसा आज का ताइवान है।

चीन जापान के बीच 1937 में फिर युद्ध छिड़ा। बाद में दूसरा  विश्वयुद्ध 1939 में शुरू हुआ तो भी चीन  जापान जंग चलती रही। जापान ने एक तरह से चीन को फिर करारी शिकस्त मिली। लेकिन जब अमेरिका ने 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए तो जापान की कमर टूट गई। उसने ताइवान चीन को लौटा दिया।

दरअसल, इसके बाद असल खेल शुरू हुआ। उन दिनों च्यांग काई शेक के नेतृत्व में कुओमिन्तांग पार्टी पच्चीस साल से सत्ता में थी। च्यांग काई शेक ने ही चीन का नाम रिपब्लिक ऑफ चाइना किया था।लंबे समय तक खराब प्रशासन के कारण लोगों का ग़ुस्सा च्यांग काई शेक और उसकी पार्टी से था। इसका फ़ायदा कम्युनिस्टों ने उठाया।

वे माओ त्से तुंग की अगुआई में च्यांग सत्ता के ख़िलाफ़ लड़ने लगे। देश में गृह युद्ध छिड़ गया। च्यांग काई शेक और उसकी पार्टी कुओमिन्तांग को मुंह की खानी पड़ी। माओ त्से तुंग ने इसके बाद 1950 में चीन का नाम पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना रख लिया। च्यांग और उसकी सरकार जापान से मिले ताइवान में भाग गई। कम्युनिस्टों की नौसेना की ताक़त कमज़ोर थी, इसलिए वे ताइवान पर क़ब्ज़ा नहीं कर सके। च्यांग कई शेक ने ताइवान में अपनी सरकार बनाई क्योंकि 1945 में उसकी पार्टी ने ही जापान से ताइवान का आधिपत्य लिया था।

इसलिए लड़ रहे हैं चीन और ताइवान 
बस इसके बाद से ही दोनों देश अपने अपने को असली चीन बता रहे हैं और झगड़ रहे हैं। हालांकि 1980 में रिश्तों में जमीं बर्फ़ पिघली। थोड़ा बहुत प्रेमालाप हुआ। लेकिन बाद में गाड़ी पटरी से फिर उतर गई। जब चेन बियान 2000 में ताइवान के राष्ट्रपति चुने गए तो उन्होंने भी चीन की वन कंट्री टू सिस्टम प्रस्ताव को ठुकरा दिया। चीन इससे आगबबूला था। उसका पारा पिछले महीने सातवें आसमान पर जा पहुंचा,जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ताइवान की राष्ट्रपति साईं इंग वेन को फ़ोन किया और उन्हें समर्थन -सहयोग का भरोसा दिया।
 

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अमेरिका ताइवान का इकलौता भरोसेमंद दोस्त है। - फोटो : REUTERS
आप कह सकते हैं कि अमेरिका ताइवान का इकलौता भरोसेमंद दोस्त है। क़रीब चालीस साल पहले अमेरिकी कांग्रेस ने ताइवान रिलेशन एक्ट पास किया था।उसमें कहा गया था कि अमेरिका ताइवान को सैनिक सहायता और हथियार देगा। यदि चीन ने ताइवान पर हमला किया तो अमेरिका बेहद गंभीरता से लेगा। चीन इससे भी भड़का हुआ है। एक उदाहरण काफी होगा। जब  ताइवान में 1996 के राष्ट्रपति चुनाव हो रहे थे तो चीन ने ज़बरदस्त मिसाइल परीक्षण और सैनिक शक्ति का प्रदर्शन किया। उत्तर में अमेरिका ने भी अपने जंगी जहाज़ ताइवान की ओर भेजे। चीन को क़दम पीछे खींचने पड़े।

चीन की सीमाएं 14 देशों से सटी हुई हैं। इनमें भारत,भूटान ,नेपाल ,म्यांमार,पाकिस्तान और रूस जैसे अनेक देश शामिल हैं। कई पड़ोसियों से चीन के सीमा विवाद चल रहे हैं। विवाद सुलझाने में चीन का अड़ियल,कारोबारी और विस्तारवादी रवैया आड़े आता है। यह रवैया चीन को बदलना ही पड़ेगा क्योंकि अब उसकी पोल खुलने लगी है। भारत के लिए इस घटनाक्रम पर बारीक़ नज़र रखना बेहद आवश्यक है।       



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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