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ब्लड रिलेशन में शादी करना खतरनाक
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 19 Mar 2016 03:30 PM IST
सार
- देश में 10 से 20 लाख बच्चे अनुवांशिक बीमारियों से पीड़ित
- 45 में से मात्र छह बीमारियों का निदान होता संभव
- बचने के लिए जीवन भर देनी पड़ती आर्टिफिशियल इंजाइम्स थेरेपी
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श्ाादी करने से पहले कर लें पूरी पड़ताल
- फोटो : demo
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विस्तार
जन्मजात बीमारी बच्चों की जिंदगी और परिवारीजनों की आर्थिक स्थिति को खराब कर रही है। ये मुख्य रूप से एक गोत्र में शादी करने वालों के बच्चों में अधिक होती है। इससे बचाव के लिए ब्लड रिलेशन में शादी न करना ही बेहतर है। क्योंकि ऐसा करने पर होने वाले बच्चे को जानलेवा व लाइलाज बीमारियां हो सकतीं हैं। गर्भ के दौरान आनुवांशिक बीमारियों की चपेट मेें आने वाले बच्चों में होने वाली 45 बीमारियों का इलाज देश में नहीं है।
देशों में इनका इलाज तो है लेकिन इतना महंगा है कि हर किसी के बस की बात नहीं। जन्मजात बीमारी की चपेट में आकर बच्चे मौत के गाल में समा रहे हैं। ये जानकारी शुक्रवार को लाइजोजोमल स्टोरेज डिसऑर्डर सपोर्ट सोसाइटी की ओर से प्रेस क्लब में रेयर डिजीज विषय पर आयोजित कार्यक्रम में संस्था के उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह त्यागी ने दी। राजेंद्र त्यागी ने बताया कि देश में 45 ऐसी बीमारियां है जो जन्मजात मिलती हैं और इनका कोई भी इलाज नहीं है। इन बीमारियों को देश में आनुवंशिक बीमारियों की श्रेणी में रखा गया है।
न 45 बीमारियों में से केवल छह का निदान संभव है जिसमें गाउचर, एमपीएस 1,2,4,6 के साथ फ्रैब्रिक डिजीज शामिल हैं। बच्चे जन्मजात इन बीमारियों के साथ पैदा होते हैं। इसका कारण क्या है ये स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंजाइम थेरेपी की मदद से इन बीमारियों से पीड़ित बच्चों को नई जिंदगी दी जा सकती है। हालांकि इससे बचाव के लिए यह थेरेपी जीवन भर दी जाती है। देश में करीब दस से बीस लाख बच्चे आनुवांशिक बीमारी से पीड़ित हैं। इसमें से सिर्फ 690 ही पंजीकृत हैं।
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यूपी में इस बीमारी से पीड़ित पंजीकृत बच्चों की संख्या 52 थी जिनमें से सात की मौत हो चुकी है। अभी 45 का इलाज जारी है। संस्था के अध्यक्ष मंजीत सिंह के अनुसार रेयर डिजीज से पीड़ित बच्चे के इलाज पर 40 लाख से दो करोड़ रुपये का खर्च आता है। इन दवाओं को अमेरिका व ब्रिटेन से मंगाया जाता है। गाउचर बच्चों की एेसी ही एक बीमारी है। इससे दिल, किडनी, लिवर और तिल्ली बढ़ने लगती है। पेट फूलने लगता और शरीर के साथ भीतरी अंगों का आकार सामान्य से अलग होने लगता है। कुछ समय बाद बच्चे के अंग भीतर ही भीतर डैमेज होने लगते हैं और कुछ समय में कुछ समय में बच्चे की मौत हो जाती है।
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देशों में इनका इलाज तो है लेकिन इतना महंगा है कि हर किसी के बस की बात नहीं। जन्मजात बीमारी की चपेट में आकर बच्चे मौत के गाल में समा रहे हैं। ये जानकारी शुक्रवार को लाइजोजोमल स्टोरेज डिसऑर्डर सपोर्ट सोसाइटी की ओर से प्रेस क्लब में रेयर डिजीज विषय पर आयोजित कार्यक्रम में संस्था के उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह त्यागी ने दी। राजेंद्र त्यागी ने बताया कि देश में 45 ऐसी बीमारियां है जो जन्मजात मिलती हैं और इनका कोई भी इलाज नहीं है। इन बीमारियों को देश में आनुवंशिक बीमारियों की श्रेणी में रखा गया है।
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न 45 बीमारियों में से केवल छह का निदान संभव है जिसमें गाउचर, एमपीएस 1,2,4,6 के साथ फ्रैब्रिक डिजीज शामिल हैं। बच्चे जन्मजात इन बीमारियों के साथ पैदा होते हैं। इसका कारण क्या है ये स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंजाइम थेरेपी की मदद से इन बीमारियों से पीड़ित बच्चों को नई जिंदगी दी जा सकती है। हालांकि इससे बचाव के लिए यह थेरेपी जीवन भर दी जाती है। देश में करीब दस से बीस लाख बच्चे आनुवांशिक बीमारी से पीड़ित हैं। इसमें से सिर्फ 690 ही पंजीकृत हैं।
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यूपी में इस बीमारी से पीड़ित पंजीकृत बच्चों की संख्या 52 थी जिनमें से सात की मौत हो चुकी है। अभी 45 का इलाज जारी है। संस्था के अध्यक्ष मंजीत सिंह के अनुसार रेयर डिजीज से पीड़ित बच्चे के इलाज पर 40 लाख से दो करोड़ रुपये का खर्च आता है। इन दवाओं को अमेरिका व ब्रिटेन से मंगाया जाता है। गाउचर बच्चों की एेसी ही एक बीमारी है। इससे दिल, किडनी, लिवर और तिल्ली बढ़ने लगती है। पेट फूलने लगता और शरीर के साथ भीतरी अंगों का आकार सामान्य से अलग होने लगता है। कुछ समय बाद बच्चे के अंग भीतर ही भीतर डैमेज होने लगते हैं और कुछ समय में कुछ समय में बच्चे की मौत हो जाती है।