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छत्तीसगढ़ चुनाव 2018 : दंतेवाड़ा जैसी घटना अंजाम देने की फिराक में थे हथियारों से लैस नक्सली

Wed, 14 Nov 2018 08:08 AM IST
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 14 Nov 2018 08:08 AM IST
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chhattisgarh election 2018: Maoists planned a major casualties Incidents like Dantewada in Pamed
प्रतीकात्मक तस्वीर

पामेड़ में कोई दर्जनभर नक्सली नहीं थे, बल्कि उनकी एक पूरी कंपनी थी। मकसद था, दंतेवाड़ा जैसी बड़ी घटना को अंजाम देना। रॉकेट लांचर, मोर्टार, हैवी एलएमजी और अंडर बैरल ग्रेनेड लांचर (यूबीजीएल) जैसे घातक हथियारों से लैस नक्सली, टिप्पापुरम स्थित सीआरपीएफ की कोबरा इकाई के कैंप से महज आठ-दस किलोमीटर दूर तक पहुंच गए थे। 

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दूसरी ओर, वहां से करीब छह किलोमीटर दूर गांव पामेड़ था, जहां पर वोटिंग चल रही थी। अच्छा यह हुआ कि बीच राह में नक्सलियों का सामना कोबरा दस्ते से हो गया। नक्सलियों की ओर से करीब सात हजार राउंड गोलियां दागी गई, जबकि दो दर्जन से अधिक ग्रेनेड, लगभग 18 रॉकेट लांचर व यूबीजीएल से भी हमला किया गया। कोबरा जवान, जिनकी संख्या नक्सलियों के मुकाबले आधी भी नहीं थी, ने नक्सल कंपनी का मुकाबला किया। सीआरपीएफ का दावा है कि इस हमले में करीब डेढ़ दर्जन नक्सली मारे गए हैं या फिर वे गंभीर रुप से घायल हुए हैं। 
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बस्तर में सीआरपीएफ के आईजी संजय अरोड़ा भी इस बात को मानते हैं कि नक्सली किसी बड़े इरादे से आए थे। उनका टारगेट कोबरा कैंप या फिर जंगल में ऑपरेशन पर निकले दस्ते को भारी नुकसान पहुंचाना था। नक्सलियों के पास इतने खतरनाक हथियार, इस सवाल के जवाब में अरोड़ा का कहना था कि एलएमजी और यूबीजीएल आदि तो सुरक्षा बलों के पास ही होते हैं। सुरक्षा बलों पर जो बड़े हमले हुए हैं, उसी वक्त ये उनके हथियार छीन कर ले जाते हैं। 
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कुछ हथियार ऐसे भी होते हैं, जिनमें थोड़ा-बहुत बदलाव कर उनकी मारक क्षमता को बढ़ा दिया जाता है। हां, रॉकेट लांचर ये खुद ही बनाने लगे हैं। यह अलग बात है कि उनकी मारक क्षमता सुरक्षा बलों के रॉकेट लांचर के मुकाबले थोड़ी कम होती है। ये साढ़े तीन सौ मीटर तक की मार करते हैं।

आईजी के मुताबिक, नक्सलियों के ऐसे ठिकानों को नष्ट करने के लिए अब सुरक्षा बल जंगल में आखिर तक जाने की रणनीति बना रहे हैं। जहां-जहां ये हथियार बनते हैं, उनकी जानकारी जुटाई जा रही है। अंदर घुसकर मारने के अलावा अब दूसरा कोई विकल्प नहीं है। बता दें कि साल 2010 में दंतेवाड़ा के नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे।  

करीब डेढ़ किलोमीटर तक जंगल में नक्सलियों ने जाल बिछा रखा था...

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ऑपरेशन से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि कोबरा-204 इकाई को भारी नुकसान पहुंचाने के लिए नक्सलियों ने डेढ़ किलोमीटर लंबे क्षेत्र में जाल बिछा रखा था। नक्सलियों ने चारों तरफ से फ़ायरिंग शुरू कर दी। हर एक नक्सली ने पेड़ को अपनी ढाल बनाया हुआ था। तीन घंटे से भी ज्यादा समय तक मुठभेड़ चली।

पांच बार ऐसे भी मौके आए जब लगा कि नक्सली भाग गए हैं। जैसे ही कोबरा इकाई चौकसी से आगे कदम बढ़ाती, तुरंत गोलियां बरसनी शुरू हो जाती। चूंकि जवानों की संख्या भी कम थी और उनके पास गोला-बारूद व हथियार भी एक तय मात्रा में ही थे, इसलिए अंधाधुंध तरीके से नक्सलियों की तरह फायरिंग भी नहीं करनी थी।

कोबरा इकाई के कई जवान जो कि ग्रेनेड और यूबीजीएल से लैस थे, उन्होंने अपनी व्यूहरचना से करीब एक किलोमीटर तक का रास्ता साफ करा दिया।ढाई घंटे की मुठभेड़ के बाद नक्सलियों को लगने लगा कि अब भागने के अलावा दूसरा चारा नहीं है। तब तक छत्तीसगढ़ पुलिस की एसटीएफ भी मौक़े पर पहुंच चुकी थी।

मुठभेड़ में कोबरा टीम के पांच सदस्य भी घायल हो गए। आईजी संजय अरोड़ा ने संभावना जताई है कि इस मुठभेड़ में कम से कम डेढ़ दर्जन से ज्यादा नक्सलियों को भारी चोट पहुंची है। चूंकि नक्सली अपने साथियों के शव मुठभेड़ स्थल पर नहीं छोड़ते, इसलिए अभी तक कोई शव बरामद नहीं हुआ है। कोबरा और एसटीएफ द्वारा सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया है।

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