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अवैध गर्भपात मामला : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 3 डॉक्टरों को ठहराया दोषी, अस्पताल में बोतलों में मिले थे भ्रूण

Sat, 26 Sep 2026 02:12 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: अमन कोशले Updated Sat, 26 Sep 2026 02:12 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने लाइफ केयर अस्पताल से जुड़े 2011 के मामले में 3 डॉक्टरों को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट और आईपीसी की धारा 315 के तहत दोषी ठहराया है। अस्पताल में 16 से 32 सप्ताह के कई भ्रूण संरक्षित हालत में मिले थे।

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Illegal abortion case CG High Court holds 3 doctors guilty, foetuses were found in bottles at hospital
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कोरबा जिले के दीपका स्थित लाइफ केयर अस्पताल से संबंधित 15 साल पुराने अवैध गर्भपात मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने निचली अदालत के बरी करने के आदेश को आंशिक रूप से बदलते हुए तीन डॉक्टरों को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) कानून के अंतर्गत दोषी ठहराया है। उच्च न्यायालय के इस निर्णय से डेढ़ दशक पुराने प्रकरण में आरोपियों की कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल गई है।
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15 साल पुराना मामला
यह पूरा मामला 7 अगस्त, 2011 का है। उस समय कोरबा जिले के तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और कठघोरा के उप मंडल अधिकारी (एसडीएम) की प्रशासनिक टीम ने दीपका स्थित लाइफ केयर अस्पताल में छापा मारा था। कार्रवाई के दौरान जांच टीम ने अस्पताल परिसर से अलग-अलग बोतलों में रखे 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण बरामद किए थे। इस छापेमारी में अस्पताल से कुछ समय-सीमा समाप्त (एक्सपायर्ड) औषधियां और अवैध गर्भपात में प्रयोग किए जाने वाले उपकरण भी जब्त किए गए थे। बरामद सामग्री के आधार पर संबंधित चिकित्सकों के विरुद्ध विधिक कार्रवाई आरंभ की गई थी।
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निचली अदालत ने किया था बरी
इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई कठघोरा के अपर सत्र न्यायालय में हुई थी। प्रकरण की विस्तृत सुनवाई के पश्चात निचली अदालत ने आरोपी डॉ. राजेंद्र प्रसाद रविदास, डॉ. मिथिलेश प्रसाद और रेणु श्रीवास्तव को बरी करने का फैसला सुनाया था। निचली अदालत के इस आदेश को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी। राज्य सरकार की याचिका पर विचार करते हुए उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के रिकॉर्ड का गहन परीक्षण किया और सुनवाई पूरी की।
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चिकित्सीय आवश्यकता सिद्ध करने में सफल न होना
उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत के निर्णय में आंशिक संशोधन किया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि आरोपी डॉक्टर यह प्रमाणित करने में पूरी तरह नाकाम रहे कि दीपका स्थित अस्पताल में मिले 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण किसी वैध चिकित्सीय आवश्यकता के अधीन अथवा सद्भावनापूर्वक रखे गए थे। अदालत ने तीनों चिकित्सकों को एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोप में दोषी ठहराया है।
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