World Environment Day: लॉकडाउन ने सिखाया, शहरों को कैसे ला सकते हैं प्रकृति के करीब
- लॉकडाउन में प्रदूषण का स्तर सबसे निचले स्तर पर गया
- चंडीगढ़ में प्रदूषण कम होने की एक वजह बारिश भी रही
- पर्यावरण संरक्षण करना है तो प्लास्टिक का त्याग कर दें
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लॉकडाउन में चंडीगढ़ शहर को प्रकृति के करीब जाते दिखे। सोशल मीडिया पर जालंधर से बर्फीली चोटियां और कांगड़ा से हिमालय दिखाने का दावा करने वाली तस्वीरें दिखीं तो चंडीगढ़ की हवा देश में सबसे साफ हो गई। लॉकडाउन के दौरान सड़कें सूनी थीं। गाड़ियों की आवाजाही नाम मात्र की थी। फैक्ट्री, निर्माण कार्य बंद थे। इससे प्रदूषण का स्तर सबसे निचले स्तर पर चला गया।
लॉकडाउन में छूट मिलने के बाद प्रदूषण में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन लॉकडाउन से आम लोग और सरकारें सबक ले सकती हैं कि कुछ कदम उठाने से ही वायु प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे यह भी पता चलता है कि यदि लोग चाहें तो क्या कुछ नहीं हो सकता। जो काम सालों से सरकारें या प्रशासन नहीं कर पाया, वो काम लॉकडाउन ने कर दिखाया।
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लेकिन अब सवाल उठता है कि जब कोरोना संकट दूर होगा तो उस स्थिति में प्रदूषण के स्तर को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञ प्रो. रविंद्र खैवाल का कहना है कि यह साल सबसे अलग है। इस साल बारिश भी खूब हो रही है और प्रदूषण का स्तर भी कम है। चंडीगढ़ में प्रदूषण कम होने की एक वजह बारिश भी रही है।
इस पर शोध करने की आवश्यकता है, लेकिन मोटे तौर पर यह कहने में बिल्कुल गुरेज नहीं कि प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए प्रशासन के साथ आम लोगों, विशेषज्ञों और एनजीओ की भागीदारी अहम होगी। बिना टीम वर्क के इस मिशन को पूरा नहीं कर सकेंगे।
ये कदम उठाए जा सकते हैं
- पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बैटरी संचालित वाहनों में तब्दील करना
- साइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए खरीददारी में छूट देना
- सर्विस सेक्टर में एक दिन वर्क फ्रॉम होम के कल्चर को बढ़ावा देना
- गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने के लिए सख्त नियम लागू करना
- मिट्टी की उर्वरकता के लिए अलग-अलग किस्म के पौधे लगाना
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प्लास्टिक के थैले को छोड़ने का यह सही वक्त
कोरोना संकट प्लास्टिक को छोड़ने का सही वक्त है। अमेरिका के नेशनल हेल्थ इंस्टीट्यूट के मुताबिक, कोरोना का वायरस प्लास्टिक की सतह पर करीब दो से तीन दिन तक जिंदा रह सकता है। ऐसे में कोविड-19 से बचाव के लिए प्लास्टिक से दूरी बनाना बहुत जरूरी है। शॉपिंग करने या सब्जी लेने जाएं तो अपना थैला लेकर जाएं। कपड़े का थैला होगा तो बाहर से लाने के बाद उसे धो सकते हैं।
साल में दो पौधे लगाकर उन्हें गोद लें
मानसून में पौधा रोपण अभियान के बाद 70 फीसदी पौधे सूख जाते हैं। असल जिम्मेदारी पौधे लगाने के बाद उन्हें पानी और सुरक्षा देने की होती है। साल में सिर्फ दो पौधे लगाइए और उन्हें गोद ले लें। यहां पर गोद लेने का मतलब उन्हें सुरक्षा देने से है। पौधे को पानी, खाद और जानवर से सुरक्षा से मिलती रहे तो बड़ा होकर लोगों के काम आएगा।
कार से उतरकर साइकिल पर चढ़ने का वक्त
लॉकडाउन में मिली छूट के बाद अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया, इटली में यदि किसी चीज की बिक्री बढ़ी है तो वह साइकिल है। साइकिल खरीदने के पीछे एक वजह यह मानी जा रही है कि लॉकडाउन के दौरान वातावरण में जो सुधार आया है, उसका लोगों पर गहरा असर हुआ है। दूसरा इन देशों में कई रास्तों पर कार से जाने पर पाबंदी लग गई है। भारत में भी साइकिल के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। साइकिल चलाएंगे तो कार्बन का उत्सर्जन शून्य होगा। कार चलाने से पेट्रोल/डीजल के जलने से कार्बन का उत्सर्जन होता है, जो वातावरण के लिए बेहद हानिकारक है।
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पानी की एक-एक बूंद बचानी है
कई अध्ययनों के बाद पता चला है कि एक व्यक्ति अमूमन रोज 45 लीटर पानी बर्बाद करता है। यह पानी लोग हाथ धोते, ब्रश करते समय व बर्तन साफ करने के दौरान खुला नल छोड़ने की आदत से बर्बाद होता है। पानी की बर्बादी उस वक्त सबसे ज्यादा होती है, जब टंकी भरने के बाद भी रोज 15 मिनट तक मोटर चलती रहती है। टंकी से बहकर यह पानी बर्बाद हो जाता है। एक मिनट में टंकी में 8 लीटर पानी जाता है। 15 मिनट टंकी से पानी बहने का मतलब है 120 लीटर पानी की बर्बादी। पानी के ट्रांसमिशन में भी बहुत पानी बर्बाद होता है।