डॉ. देवव्रत को हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाने के पीछे का सच
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आचार्य देवव्रत को हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाकर भाजपा ने बड़ा दांव खेला है। पार्टी का मानना है कि आरक्षण रद होने से खफा जाटों खास करके हरियाणा के जाटों की नाराजगी इस कदम से दूर होगी।
मूल रूप से पानीपत जिले के पावटी गांव के निवासी आचार्य देवव्रत साधारण जाट परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनकी शिक्षा दीक्षा हिसार के आर्य समाजी ब्रह्म महाविद्यालय में हुई। पिछले करीब तीन दशक से वे कुरूक्षेत्र में आर्य समाज द्वारा संचालित गुरुकुल में प्रधानाचार्य हैं।
सीबीएसई से संबद्ध यह ‘गुरुकुल’ वास्तव में प्राचीन और आधुनिक शिक्षा प्रणाली का मिश्रण है। आम तौर पर राजनीति से दूर अध्ययन-अध्यापन की दुनिया में व्यस्त रहने वाले आचार्य देवव्रत को राज्यपाल बनाकर भाजपा ने हरियाणा के करीब 70 लाख जाटोंको साधने की कोशिश की है।
जाट बहुल राजनीतिक माहौल बना बड़ा कारण
गौरतलब है कि हरियाणा में शुरू से ही जाटों की भूमिका राजनीति में प्रभावी रही है। इसका बड़ा कारण यह भी है कि प्रदेश में जाटों की बड़ी संख्या होने के साथ ही उनका राजनीतिक रूप से जागरूक होना भी है।
अनुमान के मुताबिक करीब 2 करोड़ 54 लाख की आबादी वाले हरियाणा में गुरनाम कमीशन के आधार पर 25 प्रतिशत आबादी जाटों की है। इस लिहाज से लगभग 70 लाख जाट है। खास बात यह भी है कि इनमें से जाट समुदाय का बड़ा वर्ग आर्यसमाजी है।
इस लिहाज से भाजपा ने आचार्य देवव्रत को राज्यपाल बनाकर जाटों के साथ ही आर्य समाज को भी साधने का प्रयास किया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे।
जानकारों के मुताबिक इस दौरान जाट आरक्षण रद्द होने के मसले पर भी चर्चा हुई थी। इस चर्चा के दौरान आचार्य देवव्रत की नियुक्ति से राजनीतिक फायदे के गणित पर भी विचार हुआ था।