ये भी है चुनावी समर की हॉट सीट, जो जीता वही बना मंत्री
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बठिंडा शहरी सीट का प्रभाव ऐसा है कि जो उम्मीदवार यहां से जीतता है, सरकार बनने पर मंत्री बनता है। यहां के वोटरों ने हर बार हिंदू नेता पर ही ज्यादा भरोसा जताया है।
इसी के चलते कांग्रेस ने 1957 से लेकर 2012 तक सिर्फ दो बार किसी सिख नेता को बठिंडा शहरी से चुनाव मैदान में उतारा। इसमें एक बार उसे जीत नसीब हुई है।
इस साल तीसरी बार कांग्रेस ने गैर हिंदू नेता मनप्रीत बादल को मैदान में उतारा है। दूसरी तरफ अकाली दल ने सरूप चंद सिंगला और आम आदमी पार्टी ने दीपक बांसल पर दांव लगाया है।
यहां के वोटरों को हिंदू नेता पर ही ज्यादा भरोसा
पिछले छह दशकों में बठिंडा सीट से कांग्रेस ने सात बार, आजाद ने एक बार, अकाली दल ने चार बार और जनता दल के उम्मीदवारों ने एक बार जीत हासिल की है। यहां से दो ही बार सरकार विरोधी पार्टी का उम्मीदवार जीतने में कामयाब रहा है।
2007 तक बठिंडा के साथ लगते गांव भी पहले शहर में आते थे लेकिन चुनाव आयोग की तरफ से 2012 से पहले एक नियम के तहत बठिंडा से गांव काटकर बठिंडा शहरी हलका बना दिया गया था।
शहरी सीट के कुल 1,83,813 वोट
पुरुष 97279
महिला 86534