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लेखक ने जितना आपको लिख कर दिया उससे आगे भी एक दुनिया है : डॉ. देवेंद्र
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चंडीगढ़। लेखक ने जितना लिखकर दिया है उससे आगे भी एक दुनिया है जो आपको खोजनी है। यही नहीं पात्रों की वेशभूषा, मंच पर उनकी छोटी से छोटी गतिविधि जब जानने को मिली, तब जाकर कहीं पता लगा कि रंगमंच एक बहुत गहरी विधा है जिसके लिए समय और समर्पण दोनों चाहिए। यह बात टीएफटी रंग संवाद के दूसरे सत्र के 54वीं कड़ी के दौरान डॉ. देवेंद्र राज अंकुर ने टीएफटी के निर्देशक सुदेश शर्मा के साथ संवाद के दौरान कही।
उन्होंने कहा कि शायद यही वजह थी निर्देशन चुनने को प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को चुना। गर्व से कह सकता हूं कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक होकर 1972 से लेकर आज 2022 तक इस कारवां को 50 साल पूरे हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक होकर बाहर आया तो तीन चीजें अपने लिए तय की थी। पहली यह की नौकरी नहीं करनी है और केवल रंगमंच करते हुए अपनी रोजी रोटी कमाना है। दूसरा अपनी मर्जी का काम करना है जिससे हमें खुशी और शांति मिलती हो। तीसरा यह कभी किसी के पास जाकर अपनी ओर से काम के लिए आग्रह नहीं करना।
कॉलेज स्तर तक इतना ही पता था कि संवाद याद कर मंच पर बोलने को ही रंगमंच कहते हैं, लेकिन नाटक के संवादों के पीछे भी कोई अर्थ होता है इसकी हमें तनिक भी जानकारी नहीं थी। जब मोहन महर्षि और राम गोपाल बजाज सरीखे कलाकारों के सानिध्य में पहुंचे तो पता चला रंगमंच का वास्तविक अर्थ क्या है।
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कौन हैं डॉ. देवेंद्र राज अंकुर
डॉ. देवेंद्र राज अंकुर भारतीय नाट्य विद्यालय से स्नातक और पूर्व निर्देशक व संगीत नाटक अवार्डी है। अंकुर के निर्देशन में हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू पंजाबी, बंगाली, तामिल, उड़िया, कन्नड़ और मलयालम की लगभग 500 से भी अधिक कहानियों, 20 से भी अधिक उपन्यास और 60 से भी अधिक नाटकों का मंचन हो चुका है।
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उन्होंने कहा कि शायद यही वजह थी निर्देशन चुनने को प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को चुना। गर्व से कह सकता हूं कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक होकर 1972 से लेकर आज 2022 तक इस कारवां को 50 साल पूरे हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक होकर बाहर आया तो तीन चीजें अपने लिए तय की थी। पहली यह की नौकरी नहीं करनी है और केवल रंगमंच करते हुए अपनी रोजी रोटी कमाना है। दूसरा अपनी मर्जी का काम करना है जिससे हमें खुशी और शांति मिलती हो। तीसरा यह कभी किसी के पास जाकर अपनी ओर से काम के लिए आग्रह नहीं करना।
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कॉलेज स्तर तक इतना ही पता था कि संवाद याद कर मंच पर बोलने को ही रंगमंच कहते हैं, लेकिन नाटक के संवादों के पीछे भी कोई अर्थ होता है इसकी हमें तनिक भी जानकारी नहीं थी। जब मोहन महर्षि और राम गोपाल बजाज सरीखे कलाकारों के सानिध्य में पहुंचे तो पता चला रंगमंच का वास्तविक अर्थ क्या है।
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कौन हैं डॉ. देवेंद्र राज अंकुर
डॉ. देवेंद्र राज अंकुर भारतीय नाट्य विद्यालय से स्नातक और पूर्व निर्देशक व संगीत नाटक अवार्डी है। अंकुर के निर्देशन में हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू पंजाबी, बंगाली, तामिल, उड़िया, कन्नड़ और मलयालम की लगभग 500 से भी अधिक कहानियों, 20 से भी अधिक उपन्यास और 60 से भी अधिक नाटकों का मंचन हो चुका है।