पंजाब में भूजल संकट: सीधी बिजाई व नानक खेती में छिपा समाधान, किसानों को फायदे ही फायदे
सुनने में कितना भयावह लगता है कि आने वाले 50 साल बाद पंजाब रेगिस्तान में बदल जाएगा। इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) के प्रोफेसर व यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज बंगलूरू के पूर्व वाइस चांसलर डॉ. पीजी चेंगप्पा ने 2014 में जब इससे जुड़े तथ्य सामने रखे थे, तो बहुत लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब पंजाब में गहराते भूजल संकट को देखते हुए डॉ. चेगप्पा की आशंका सही लगती है।
विस्तार
पंजाब की कृषि में विविधता न लाई गई, तो आने वाले समय में जलस्तर और नीचे चला जाएगा और यहां रेगिस्तान जैसी स्थिति पैदा हो जाएगी। पंजाब में हर साल भूमिगत जल 3 से 5 फीट नीचे जा रहा है। धान की खेती इसका बड़ा कारण है। दूसरी, तरह कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ईमानदारी से प्रयास किए जाएं, तो धान की सीधी बिजाई और नानक खेती से आने वाले भूजल संकट से बचा जा सकता है।
पहली तकनीक नानक खेती की है। इसमें भी धान के बीज के सीधे खेत में डाला जाता है, लेकिन इसे क्यारियों में लगाया जाता है। जमीन को कठोर हिस्से को तीन फीट तक गहरा हल चलाकर तोड़ा जाता है। फिर लंबी क्यारियों में बीज डाला जाता है। इससे जड़ें काफी गहराई तक चली जाती हैं और पौधे को पर्याप्त नमी मिल जाती है। एक किलो धान पैदा करने में करीब एक हजार लीटर पानी ही लगता है। नमी बरकरार रखने के लिए फसल के अवशेषों को क्यारियों पर बिछा दिया जाता है। कीटनाशक व खाद की जरूरत बहुत कम पड़ती है।
तीसरी तकनीक सीधी बिजाई की है, जिससे खेत को कद्दू नहीं किया जाला और न ही धान की पनीरी तैयार करनी पड़ती है। इसमें खेत को जोतने के बाद उसमें सीधे धान का बीज डाल दिया जाता है। बाद में इसकी निराई-गुडा़ई की जाती है। इस तकनीक से पानी की खपत आधे से भी कम होती है। इसमें एक किलो धान पैदा करने में 2 से ढाई हजार लीटर पानी ही लगता है और पैदावार भी ज्यादा होती है। इस तकनीक को अपनाने वाले किसान 6 से 7 प्रतिशत ही हैं। सरकार लगातार किसानों को इस तकनीक के प्रति जागरूक कर रही है।
दूसरी तकनीक में खेत को कदूद कर उसमें धान की पनीरी रोप दी जाती है। इस तकनीक का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसमें पानी की खपत बहुत ज्यादा होती है। एक किलो धान पैदा करने में 5 से 6 हजार लीटर पानी खर्च हो जाता है। दूसरा, जमीन की ऊपरी परत काफी कठोर हो जाती है, जिससे बारिश का पानी पर्याप्त मात्रा में जमीन के अंदर नहीं जाता, जिससे भूजल संकट बढ़ रहा है, क्योंकि इसमें भूमिगत जल को मोटरों से निकाल कर इस्तेमाल किया जाता है। पंजाब के अधिकतर हिस्से में इसी तकनीक से धान की रोपाई हो रही है।पारंपरिक तकनीक
धान की फसल लेने की विधियां
लुधियाना के जगराओं से संबंध रखने वाले डॉ. अमरीक सिंह गिल कहते हैं कि सीधी बिजाई के कई फायदेे हैं। इसमें झाड़ ज्यादा है, आधे पानी की बचत होती है, कीटनाशकों व खाद का इस्तेमाल भी कम करना पड़ता है। धान को जितना देर से लगाएंगे, उतना ज्यादा फायदा होगा, लेकिन इससे फसल को सूखने में ज्यादा समय लगता है और नमी ज्यादा होने के कारण आढ़ती फसल खरीदने में आनाकानी करते हैं। फिर भी हमें किसानों को देर से धान लगाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। अब कई ऐसी मशीनें आ गई हैं, जिससे सीधी बिजाई आसान हो गई है।
पंजाब में 1 जून से धान की रोपाई शुरू हो गई। पटियाला के गांव सियुना के जतिंदर सिंह कहते हैं कि हम सीधी बिजाई करके आने वाली पीढ़ी के लिए भूजल बचा सकते हैं। सरकार इस तकनीक को प्रोत्साहित कर रही है। धान की 1401 और 1692 किस्में सीधी बिजाई के लिए मुफीद हैं।
जतिंदर सिंह अकेले नहीं हैं, जो इस तकनीक से खेती कर रहे हैं, लेकिन पंजाब में अभी इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों की संख्या 6 से 7 प्रतिशत ही है। कृषि विशेषज्ञ डॉ. विनोद कुमार चौधरी के अनुसार 90 से 92 प्रतिशत किसान अब भी धान की फसल लेने के लिए पारंपरिक तकनीक ही अपना रहे हैं, जबकि सीधी बिजाई व नानक खेती से भूजल संकट का समाधान किया जा सकता है। डॉ. चौधरी के अनुसार किसानों को सही जानकारी नहीं दी जा रही। किसानों को यह समझना होगा कि धान तालाब की फसल नहीं है। इसे कम पानी में भी उगाया जा सकता है। अभी इसमें पानी की खपत सबसे ज्यादा है। वह कहते हैं कि हमें श्री गुरु नानक देव जी के संदेश- पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत... का अनुसरण करना चाहिए।
पटियाला के गांव सियुना के किसान जतिंदर सिंह पिछले पांच वर्षों से अपनी 10 एकड़ जमीन पर धान की सीधी बिजाई कर रहे हैं। वह बताते हैं कि इस तकनीक से उनकी पानी की खपत आधी रह गई है। खेती का खर्च भी 20 प्रतिशत तक कम हो गया है। इतना ही नहीं, इस तकनीक का असर अगली गेहूं की फसल पर भी पड़ने लगा है, जिससे पैदावार बढ़ गई है।
पंजाब के 118 ब्लॉक रेड जोन में
पंजाब में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। प्रदेश के 118 ब्लॉक रेड जोन में पहुंच गए हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भूजल की उपलब्धता के लिहाज से पंजाब का 75.16 प्रतिशत हिस्सा रेड जोन में है। सिर्फ 22 ब्लॉक ही सुरक्षित जोन में पाए गए। कुल 50175.27 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र में से 35,786.32 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र भूजल दोहन से बुरी तरह से प्रभावित है। देर के जिन पांच राज्यों में सबसे अधिक भूजल दोहन हो रहा है, उनमें पंजाब सबसे ऊपर है। दूसरे स्थान पर राजस्थान और तीसरे पर दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव शामिल हैं। चौथे नंबर पर हरियाणा और पांचवें पर दिल्ली है।
पुरानी तकनीक से भी बचा सकते हैं पानी
तरनतारन के गांव रता गुदा के किसान गुरबचन सिंह मानना है कि पारंपरिक तकनीक को अपनाकर भी पानी की बचत की जा सकती है। इसे एक दम नहीं छोड़ सकते। बड़ी संख्या में श्रमिक इससे जुड़े हुए हैं। अगर अच्छे तरीके से निराई की जाए तो कीटनाशकों की जरूरत नहीं है। हमें प्राकृतिक खेती के मॉडल को अपनाना चाहिए। पराली को आग न लगाकर इसे संभाल कर रखे और इसका इस्तेमाल खेत में करें। इससे खेत में नमी बनी रहेगी और पानी की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ेगी। गुरुओं ने हमें खेती का जो तरीका बताया है, हमें उसे अपनाना चाहिए।
किस तकनीक में पानी की कितनी खपत व पैदावार
विधि- पानी की खपत (प्रति एक किलो उपज)- पैदावार (प्रति एकड़)
पारंपरिक तकनीक- 5 से 6 हजार लीटर- 25 से 30 क्विंटल
सीधी बिजाई- 2 से 2.5 हजार लीटर- 30 से 34 क्विंटल
नानक खेती- 1 हजार लीटर- 30 से 35 क्विंटल