आचार संहिता से पहले हुए प्रमोशन और ट्रांसफर को हाईकोर्ट में चुनौती
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चुनावी फायदा लेने और अपने चहेतों को लाभ देने के लिए आचार संहिता लगने से ठीक पहले अयोग्यों को प्रमोशन देने का मामला जनहित याचिका के रूप में हाईकोर्ट पहुंच गया है।
इस मामले में अमृतसर निवासी एसएस शर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आचार संहिता से ठीक पहले हुए ट्रांसफर और प्रमोशन के आदेश खारिज करने की अपील की है। हाईकोर्ट ने याची से पूछा है कि जनहित याचिका सर्विस मैटर में कैसे दाखिल की जा सकती है इसपर अगली सुनवाई पर याची अपना पक्ष रखे।
याचिकाकर्ता एसएस शर्मा की ओर से एडवोकेट सौरव खुराना ने पीआईएल बेंच के सामने दलीलें आरंभ करते हुए कहा कि पंजाब में विधानसभा चुनावों की आचार संहिता लगने से ठीक पहले बड़े स्तर पर ट्रांसफर और प्रमोशन किए गए।
2 जनवरी को नगर परिषदों के कई सुपरिंटेंडेंट ग्रेड-2 पर कार्यरत कर्मियों को सचिव पद पर प्रोमोशन्स देने के आदेश दे दिए थे। इसी तरह ट्रस्ट इंजीनियर्स को भी प्रोमोशन्स दी गई। ठीक इसी तरह अगले ही दिन 3 जनवरी को नगर परिषदों में कार्यरत जूनियर इंजीनियर्स (सिविल) और ड्राफ्ट्समैन को असिस्टेंट कॉर्पोरेशन इंजीनियर्स के पद पर प्रोमोशन्स दे दी गई।
याची से पूछा सर्विस मैटर में जनहित याचिकाएं कैसे मैंटेनेबल
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट को बताया की इस तरह प्रमोशन दिए जाने के लिए पहले से ही तय प्रावधान हैं जिसके तहत प्रोमोशन्स देने से पहले डिपार्टमेंटल प्रमोशन कमेटी (डी.पी.सी.) का गठन किया जाना जरुरी है और विजिलेंस विभाग से क्लीयरेंस लेने भी जरुरी होती है।
इन सब के बावजूद सरकार ने बिना डी.पी.सी. गठित किये और विजिलेंस से क्लीयरेंस लिए ही प्रोमोशन्स दे दी तांकि अपने करीबियों और चहेतों को प्रोमोशन्स दी जा सकें। इस सब की शिकायत सरकार को रेप्रेजेंटेटिव दे कर की गई थी जिस पर कोई भी कार्यवाही नहीं की गई है लिहाजा अब याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इन सभी प्रोमोशन्स पर रोक लगाए जाने की मांग की है ।
याची ने हाईकोर्ट में लंबित कुछ मामलों का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे ही प्रमोशन को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं लंबित हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आचार संहिता से पहले प्रमोशन और ट्रांसफर होते हैं तो इसे कानूनी रूप से कैसे गलत कहा जा सकता है।
याची ने कहा कि जब नियमों को ताक पर रखकर काम किया जाए तो वह कानूनी रूप से गलत होता है। हाईकोर्ट ने इस दलील पर कहा कि यदि पीड़ित पक्ष हाईकोर्ट आए तो उनकी याचिका को सर्विस मैटर के तौर पर सुन सकते हैं लेकिन पीआईएल नहीं।
सर्विस मैटर में जनहित याचिकाएं मान्य नहीं होती है और इससे जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कई आदेश मौजूद हैं। याची ने हाईकोर्ट से अपील की कि इस मामले में उन्हें उनका पक्ष रखने के लिए कुछ सयम दिया जाए। हाईकोर्ट ने इसपर सुनवाई को मार्च तक टाल दिया।