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एनआरआईज को इंसाफ दिलाने के लिए जसवीर सिंह शेरगिल ने छोड़ा यूके, 33 साल से कर रहे सेवा
Tue, 18 Feb 2020 03:52 PM IST
खुशबू गोयल
सुरिंदर पाल, जालंधर
सुरिंदर पाल, जालंधर
Published by: खुशबू गोयल
Updated Tue, 18 Feb 2020 03:52 PM IST
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एनआरआई
- फोटो : सांकेतिक तस्वीर
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1981 में परिवार समेत यूके गए जसवीर सिंह शेरगिल महज पांच साल में ही स्वदेश लौट आए और अप्रवासी भारतीयों (एनआरआईज) की सेवा में जुट गए। खास बात यह है कि उनके पास यूके की नागरिकता थी, जिसे उन्होंने स्वदेश लौटते समय छोड़ दी। अब वह पूरी तरह से अप्रवासी भारतीयों की समस्याओं को हल करने में जुट गए हैं। जालंधर के मिट्ठापुर इलाके के रहने वाले जसवीर सिंह शेरगिल आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। अप्रवासी भारतीयों में वह काफी लोकप्रिय हैं।
एनआरआईज के प्रति सेवा को देखकर ही अप्रवासी भारतीयों ने 2013 में उनको एनआरआई सभा का प्रधान चुना। जिस समय जसवीर सिंह शेरगिल ने एनआरआई सभा के प्रधान की कुर्सी संभाली, उस समय एनआरआई सभा के 17 हजार सदस्य थे और दो साल के कार्यकाल में ही जसवीर सिंह ने उनकी संख्या 24 हजार से ऊपर पहुंचा दी। वह कहते हैं कि इनमें सात हजार वह लोग थे, जिनको कोई अभियान चलाकर सभा का सदस्य नहीं बनाया गया बल्कि इन लोगों की समस्याओं का समाधान करवाकर उनको सभा के साथ जोड़ा गया।
2013 में जब उन्होंने प्रधान पद संभाला तब इराक में संकट चल रहा था, वहां से 450 भारतीयों को वह सकुशल स्वदेश लाने में कामयाब हुए। इस दौरान भारत सरकार पर पूरा दबाव डाला। उनका प्रयास था कि एनआरआईज को इंसाफ मिलना चाहिए, कोर्ट कचहरी में काफी लंबा वक्त लग रहा था। अदालतों में एनआरआईज के काफी केस पेंडिंग थे। सरकार के साथ तालमेल बनाया गया और स्पेशल एनआरआईज कोर्ट की स्थापना की गई।
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उनका कहना है कि उन्हें इस बात का सुकून है कि आज स्पेशल एनआरआईज कोर्ट सराहनीय कार्य कर रही है। यहां तेजी से मामले निपटाए जा रहे हैं। 2015 में जब जसवीर सिंह शेरगिल का कार्यकाल खत्म हुआ, उसके बाद भी उन्होंने एनआरआईज की समस्याओं का समाधान करवाने का क्रम जारी रखा। शेरगिल कहते हैं कि विदेशों में बसे भारतीय पंजाब आने से घबराते हैं, उन पर कोई झूठा मामला दर्ज हो सकता है, रिश्तेदार जमीनों पर कब्जे करके बैठे हैं।
परिवार अब भी रहता है यूके में
जसवीर कहते हैं कि अब यूके में बसने का दिल नहीं करता, यहां पर सेवा में बड़ा सुकून मिलता है। पत्नी गुरविंदर जीत कौर, बेटी वरिंदजीत कौर, गुरबीर कौर, निम्रत कौर व बेटा शेरमनवीर सिंह अब भी विदेशी नागरिक हैं और वह आज भी हर कदम पर उनका साथ देते हैं।
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एनआरआईज के प्रति सेवा को देखकर ही अप्रवासी भारतीयों ने 2013 में उनको एनआरआई सभा का प्रधान चुना। जिस समय जसवीर सिंह शेरगिल ने एनआरआई सभा के प्रधान की कुर्सी संभाली, उस समय एनआरआई सभा के 17 हजार सदस्य थे और दो साल के कार्यकाल में ही जसवीर सिंह ने उनकी संख्या 24 हजार से ऊपर पहुंचा दी। वह कहते हैं कि इनमें सात हजार वह लोग थे, जिनको कोई अभियान चलाकर सभा का सदस्य नहीं बनाया गया बल्कि इन लोगों की समस्याओं का समाधान करवाकर उनको सभा के साथ जोड़ा गया।
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2013 में जब उन्होंने प्रधान पद संभाला तब इराक में संकट चल रहा था, वहां से 450 भारतीयों को वह सकुशल स्वदेश लाने में कामयाब हुए। इस दौरान भारत सरकार पर पूरा दबाव डाला। उनका प्रयास था कि एनआरआईज को इंसाफ मिलना चाहिए, कोर्ट कचहरी में काफी लंबा वक्त लग रहा था। अदालतों में एनआरआईज के काफी केस पेंडिंग थे। सरकार के साथ तालमेल बनाया गया और स्पेशल एनआरआईज कोर्ट की स्थापना की गई।
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उनका कहना है कि उन्हें इस बात का सुकून है कि आज स्पेशल एनआरआईज कोर्ट सराहनीय कार्य कर रही है। यहां तेजी से मामले निपटाए जा रहे हैं। 2015 में जब जसवीर सिंह शेरगिल का कार्यकाल खत्म हुआ, उसके बाद भी उन्होंने एनआरआईज की समस्याओं का समाधान करवाने का क्रम जारी रखा। शेरगिल कहते हैं कि विदेशों में बसे भारतीय पंजाब आने से घबराते हैं, उन पर कोई झूठा मामला दर्ज हो सकता है, रिश्तेदार जमीनों पर कब्जे करके बैठे हैं।
परिवार अब भी रहता है यूके में
जसवीर कहते हैं कि अब यूके में बसने का दिल नहीं करता, यहां पर सेवा में बड़ा सुकून मिलता है। पत्नी गुरविंदर जीत कौर, बेटी वरिंदजीत कौर, गुरबीर कौर, निम्रत कौर व बेटा शेरमनवीर सिंह अब भी विदेशी नागरिक हैं और वह आज भी हर कदम पर उनका साथ देते हैं।