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लंदन, अमेरिका के बाद चंडीगढ़ में हुआ नाटक ‘कुदेसन’ का मंचन, देखिए
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 16 Nov 2016 01:30 AM IST
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नाटक ‘कुदेसन’ का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
सुचेतक रंग मंच मोहाली की ओर से आयोजित 13वें गुरशरन सिंह नाट उत्सव का समापन मंगलवार को हुआ, जिसमें अमृतसर के थिएटर ग्रुप पंजाब नाटशाला के कलाकारों ने ‘कुदेसन’ नाटक पेश किया। डेढ़ घंटे की अवधि वाले इस नाटक का निर्देशन मंचप्रीत ने किया।
जतिंदर बराड़ ने 35 साल पहले अपने निजी अनुभव के आधार पर इस नाटक को लिखा था। नाटक के टाइटल पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि कुदेसन वो औरत होती है, जिसका कोई देश नहीं होता। गरीबी के कारण परिवार वाले उसेे बेच देते हैं, और इस तरह एक जगह से दूसरी जगह बेचे जाने के कारण वह अपने ही शहर में विदेशी बन जाती है।
निर्देशक मंचप्रीत ने बताया कि यह बिहार की एक गंगा नाम की औरत की कहानी है जिसका शराबी पिता गरीबी के कारण भैंस से भी कम कीमत में उसे एक सरदार को बेच देता है। उस समय एक भैंस को 12000 रुपये में बेची जाती थी, जबकि उसका पिता उसे 6000 में बेच देता है। उस लड़की के संदूक में उसकी मर चुकी मां द्वारा दी भगवान की मूर्ति निशानी के रूप में पड़ी होती है, जब वह उस सरदार के साथ पंजाब आ जाती है तो उसके साथ उसकी देह का सौदा तो होता ही है साथ में उसके धर्म का भी हो जाता है। उसका भगवान रब्ब बन जाता है। सरदार के बाद उसी कुदेसन को एक क्रिश्चियन को बेच दिया जाता है तब उसका रब्ब गॉड में बदल जाता है। गंगा क्रिश्चियन के साथ जिस गांव में रहती है वहां एक मास्टर गांव की औरतों को पढ़ाने आता है तब उसे गंगा के बारे में पता चलता है और वह उसे शादी के लिए प्रपोज करता है। काफी मनाने के बाद गंगा मान जाती है तब मास्टर उसे कहता है कि हुण तू कुदेसन नहीं, मेरी घरवाली है।
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निर्देशक मंचप्रीत ने बताया कि पंजाब नाटशाला के अधीन इस नाटक का यह 114वां शो था, जबकि पंजाब और हरियाणा में 100 से अधिक बार इसका मंचन हो चुका है। इसके अलावा यह नाटक अमेरिका और लंदन में भी खेला जा चुका है।
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जतिंदर बराड़ ने 35 साल पहले अपने निजी अनुभव के आधार पर इस नाटक को लिखा था। नाटक के टाइटल पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि कुदेसन वो औरत होती है, जिसका कोई देश नहीं होता। गरीबी के कारण परिवार वाले उसेे बेच देते हैं, और इस तरह एक जगह से दूसरी जगह बेचे जाने के कारण वह अपने ही शहर में विदेशी बन जाती है।
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निर्देशक मंचप्रीत ने बताया कि यह बिहार की एक गंगा नाम की औरत की कहानी है जिसका शराबी पिता गरीबी के कारण भैंस से भी कम कीमत में उसे एक सरदार को बेच देता है। उस समय एक भैंस को 12000 रुपये में बेची जाती थी, जबकि उसका पिता उसे 6000 में बेच देता है। उस लड़की के संदूक में उसकी मर चुकी मां द्वारा दी भगवान की मूर्ति निशानी के रूप में पड़ी होती है, जब वह उस सरदार के साथ पंजाब आ जाती है तो उसके साथ उसकी देह का सौदा तो होता ही है साथ में उसके धर्म का भी हो जाता है। उसका भगवान रब्ब बन जाता है। सरदार के बाद उसी कुदेसन को एक क्रिश्चियन को बेच दिया जाता है तब उसका रब्ब गॉड में बदल जाता है। गंगा क्रिश्चियन के साथ जिस गांव में रहती है वहां एक मास्टर गांव की औरतों को पढ़ाने आता है तब उसे गंगा के बारे में पता चलता है और वह उसे शादी के लिए प्रपोज करता है। काफी मनाने के बाद गंगा मान जाती है तब मास्टर उसे कहता है कि हुण तू कुदेसन नहीं, मेरी घरवाली है।
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निर्देशक मंचप्रीत ने बताया कि पंजाब नाटशाला के अधीन इस नाटक का यह 114वां शो था, जबकि पंजाब और हरियाणा में 100 से अधिक बार इसका मंचन हो चुका है। इसके अलावा यह नाटक अमेरिका और लंदन में भी खेला जा चुका है।