समझौता एक्सप्रेस ब्लास्टः अगर सुरक्षा अधिकारी दिखाते सूझबूझ तो बच सकती थी कई जाने
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17 फरवरी 2007 को समझौता एक्सप्रेस ट्रेन भारतीय व पाकिस्तानी यात्रियों को लेकर लाहौर के लिए रवाना हुई। वहीं रात को पानीपत जिला के समालखा रेलवे स्टेशन के तत्कालीन कर्मचारियों ने ट्रेन की दो बोगियों में मामूली आग व धुआं उठते देखा। इसकी सूचना तत्काल दीवाना रेलवे स्टेशन समेत दिल्ली रेलवे मंडल को दी गई।
ट्रेन को दीवाना रेलवे स्टेशन से गांव सिवाह के बीच रोक लिया गया। गौरतलब है कि ट्रेन के हर डिब्बे के गेट पर आरपीएफ के अधिकारी व जवान तैनात थे और सभी गेटों को अंदर से ताला लगा कर बंद किया गया था। वहीं दोनों डिब्बों में धुएं के कारण ऑक्सीजन की कमी हो गई और यात्रियों का दम घुटने लगा।
गेट पर तैनात आरपीएफ के अधिकारियों व जवानों ने जल्दबाजी में दोनों डिब्बों के दरवाजे खोल दिए और डिब्बों में धुएं के कारण बनी कार्बन डाई आक्साइड गैस में ऑक्सीजन जा मिली और पल भर में धुएं के साथ चल रही मामूली आग धधक उठी और दोनों डिब्बों से करीब तीस-चालीस फुट तक आग की लपटें उठी, आग धधकने से पहले जो यात्री डिब्बों से कूद गए वो तो बच गए। वहीं इस ब्लास्ट में 68 लोगों की मौत हुई। यदि ट्रेन में सवार सुरक्षा अधिकारी व कर्मचारी जरा से भी समझदार होते तो इतनी बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत नहीं होगी।
सिवाह गांव के लोगों ने दिया था बहादुरी का परिचय: कादियान
12 साल पहले हुआ वो दर्दनाक वाक्या आज भी हर ग्रामीण की यादों में ताजा है। ब्लास्ट की आवाज सुनकर लोग रेलवे लाइन की ओर दौड़ पड़े थे। ट्रेन से आग की लपटें उठ रही थी। लोगों की चीख पुकार दूर तक गूंज रही थी। इस बीच लोगों ने ट्रेन से यात्रियों को निकाला था। घायलों को पानीपत के अस्पतालों में भिजवाया था।
घायलों के लिए ग्रामीणों ने अपने घर से भोजन, दूध व चाय भिजवाई थी। ग्रामीणों ने उस वाक्य में पीड़ितों की हर संभव मदद की थी। उस वक्त के रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने ग्रामीणों की तारीफ करते हुए गांव को 10 लाख की ग्रांट देने की घोषणा की थी लेकिन आज तक वो ग्रांट नहीं मिली। खुशदिल कादियान, सरपंच गांव सिवाह