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इस जेल में बंद था गोडसे, अंतिम इच्छा में मांगी थी फांसी, जानें क्यूं काटी गई थी पेड़ की टहनी
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 02 Oct 2018 09:12 AM IST
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गोडसे
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथू राम गोडसे को 15 नवंबर 1949 को अंबाला सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी। साथी नारायण आप्टे को भी फांसी दी गई थी। अंबाला सेंट्रल जेल की काल कोठरी में गोडसे और आप्टे को रखा गया था और दोनों को बी श्रेणी दी गई थी। अंबाला सेंट्रल जेल में आज भी वो पेड़ मौजूद है, जिस पर गोडसे को फांसी दी गई थी। लेकिन आज ये पेड़ ठूठ हो गया है।
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अंबाला सेंट्रल जेल में गोडसे व आप्टे को अलग-अगल काल कोठरी में रखा गया था। गोडसे ने इस दौरान अंबाला जेल प्रशासन से रोजाना सुबह मंदिर जाकर पूजा करने का समय मांगा। लेकिन उन्हें रोजाना अनुमति तो नहीं मिल पाई। लेकिन कभी-कभार गोडसे को मंदिर जाने की अनुमति दी गई। गोडसे को अंबाला सेंट्रल जेल के बिल्कुल नजदीक प्राचीन शिवमंदिर ले जाया जाता था, जहां गोडसे शिवलिंग पर जलाभिषेक करते थे।
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शोधकर्ता प्रोफेसर अवधेश पांडेय बताते हैं कि नात्थू राम गोडसे को फांसी की सजा का फरमान सुनाया गया और फांसी देने से पहले जब जेल प्रशासन ने उनकी अंतिम इच्छा पूछी तो गोडसे ने उन्हें वहीं जेल परिसर में एक विशालकाय पेड़ से लटकाकर फांसी देने को कहा। गोडसे ने अपनी अंतिम इच्छा में ये भी कहा कि पेड़ की जिस टहनी से लटकाकर उसे फांसी दी जाए, उस टहनी को बाद में काट दिया जाए, ताकि किसी और को उस टहनी पर फांसी न दी जा सके। जेल प्रशासन ने उसकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए ऐसा ही किया।
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एक दिन पहले मिलकर गई थी भाभी
नात्थू राम को फांसी देने से ठीक एक दिन पहले उनकी भाभी अपनी बेटी हिमानी से मिलने अंबाला सेंट्रल जेल पहुंची थी। नात्थू राम ने इस मुलाकात के दौरान अपनी भतीजी को एक लड्डू भी खाने को दिया था। माहौल गमगीन था और वे लोग गोडसे से मिलकर वापस लौट गए। फांसी के बाद उनके परिजनों को गोडसे का शव नहीं दिया गया, बल्कि राजपुरा बार्डर पर घग्गर नदी के पास गोडसे का दाह संस्कार कर शव अस्थियां उनके परिजनों को दे दी गई।