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Chandigarh: बेटियों को मिले हौसले की उड़ान, फिर छू लेंगी आसमान, चंडीगढ़ की बालिकाओं ने चढ़ी सफलता की सीढ़ी

Tue, 24 Jan 2023 11:38 AM IST
निवेदिता वर्मा अमर उजाला/संवाद, चंडीगढ़
अमर उजाला/संवाद, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Tue, 24 Jan 2023 11:38 AM IST
सार

पीजीआई के ट्रांसलेशनल एंड रिजनरेटिव मेडिसिन की असिस्टेंट प्रो. डॉ. अरुणा ने किडनी ट्रांसप्लांट के मरीजों में स्टैम सेल के जरिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने पर किए गए सफल शोध से एक आशा की किरण जगाई है।

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Special news from Chandigarh on Girl Day
काश्वी गर्ग। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

चंडीगढ़ की बेटियां खेलों में आगे बढ़कर विदेशी खिलाड़ियों को पटकनी देते हुए मेडल जीतकर देश का नाम रोशन कर रही हैं। इनमें एक हैं काश्वी गर्ग जिन्होंने हाल ही में इंग्लैंड में आयोजित राष्ट्रमंडल तलवारबाजी (फेंसिंग) चैंपियनशिप में दो पदक जीतकर शहर का मान बढ़ाया है। काश्वी गर्ग के माता-पिता को अपने बेटी पर गर्व है। उन्होंने कहा कि काश्वी ने पदक जीतकर शहर और देश का नाम रोशन किया है। उन्होंने अपनी बेटी की इच्छा को कभी दबाया नहीं, इसलिए आज वह सफलता की सीढ़ी चढ़ रही है।

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कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के तत्वावधान में कॉमनवेल्थ फेंसिंग फेडरेशन द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में खेलते हुए काश्वी ने जूनियर वर्ग एप्पी टीम इवेंट में कांस्य पदक जीता। इसके बाद कैडेट टीम इवेंट में अंडर 17 में खेलते हुए कांस्य पदक जीता था। राष्ट्रमंडल खेलों में एक साथ दो पदक जीतने वाली काश्वी शहर की पहली खिलाड़ी हैं। काश्वी गर्ग सेक्टर- 9 स्थित कामॅल कॉवेंट स्कूल में 12वीं की छात्रा हैं। इनके पिता डॉ. मनदीप गर्ग पीजीआई में वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट जबकि मां डॉ. सुरुचि गर्ग शहर में त्वचा रोग विशेषज्ञ हैं। दोनों ने कहा कि जब वह बेटी का लाइव मुकाबला देखते हैं तो काफी गर्व महसूस होता है। जब बेटी को लंदन में कॉमनवेल्थ पोडियम पर पदक लेते समय भारतीय ध्वज को पकड़े हुए देखा तो असीम खुशी हुई।
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काश्वी की सफलता के पीछे स्कूल प्रबंधन का भी खास योगदान है। स्कूल के शिक्षक उसका हौसला बढ़ाते हैं। वहीं चंडीगढ़ फेंसिंग एसोसिएशन को भी इस बेटी पर नाज है। पिता ने कहा कि हम अपनी बेटी पर नाज है। कोच चरणजीत कौर के साथ चंडीगढ़ तलवारबाजी एसोसिएशन के प्रधान संदीप पासी, जनरल सेक्रेटरी मनीष भी काश्वी का हौसला बढ़ाते रहते हैं। डॉ. मनदीप गर्ग का कहना है कि बेटे और बेटियों में अंतर नहीं करना चाहिए। दोनों की परवरिश एक जैसी होनी चाहिए। अगर हम लड़कियों से भेदभाव करेंगे तो उनका मनोबल गिरेगा और वह जो लक्ष्य हासिल करना चाहती हैं, नहीं कर पाएंगी। इसलिए उन्हें हौसले की उड़ान उड़ने दीजिए, जरूर अपनी मंजिल तक पहुंच जाएंगी।

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चंडीगढ़ की डॉ. अरुणा ने स्टैम सेल तकनीक में हासिल की नई उपलब्धि
सरकारी नौकरी करने वाले माता-पिता ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी बेटी एक दिन उनके साथ उनके शहर का भी नाम रोशन करेगी। ऊंची उड़ान भरने का जज्बा रखने वाली पीजीआई की डॉ. अरुणा राका ने अपनी मेहनत और लगन के बल पर ये संभव कर दिखाया है।

पीजीआई के ट्रांसलेशनल एंड रिजनरेटिव मेडिसिन की असिस्टेंट प्रो. डॉ. अरुणा ने किडनी ट्रांसप्लांट के मरीजों में स्टैम सेल के जरिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने पर किए गए सफल शोध से एक आशा की किरण जगाई है। उन्होंने साबित किया है कि स्टैम सेल थेरेपी के जरिए किडनी ट्रांसप्लांट के मरीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती प्रदान की जा सकती है जिससे उन मरीजों को को ताउम्र इम्यूनोसेपरेसिव ड्रग खाने से बचाया जा सकता है। डॉ. अरुणा के सराहनीय योगदान के कारण ही इन्हें इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी की तरफ से दो बार यंग नेफ्रोलॉजिस्ट सम्मान प्रदान किया जा चुका है।

ढोल ऐसा बजाया...एक बार सतिंदर सरताज को भी झुमाया
लड़की होकर ढोल बजाने का शौक रखना भी अपने आप में एक अलग ही बात है। कुछ ऐसा ही है सेक्टर-27 निवासी जहान गीत सिंह के साथ। उनका शौक ऐसा था जिसमें कोई गुरु बनने को तैयार नहीं था। एक सरदार जी ने ढोल बजाने की कला उन्हें सिखाने का फैसला लिया तो ढोल की थाप पर सतिंदर सरताज को भी एक बार के लिए झूमने पर मजबूर कर दिया। आज वह 500 से ज्यादा मंच पर लाइव प्रस्तुति दे चुकी हैं। इसके लिए चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से वर्ष 2013 में तत्कालीन प्रशासक ने उन्हें पुरस्कृत भी किया था।



जहान गीत ने बताया कि उन्हें बचपन में घर से गर्मियों की छुट्टियों में सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए भेजा जाता था, लेकिन उनका मन कुछ अलग करने का था। एक दिन कुछ ढोल वालों को ढोल बजाते देखा तो सोचा कि इसकी थाप पर न जाने कितने लोग थिरकने लगते हैं। बस यही बजाना है। घर पहुंचकर अपने शौक के बारे में बताया तो वहां से भी हरी झंडी मिल गई क्योंकि परिवार का नाता पंजाब से था।

उन्होंने बताया कि उनके पिता उन्हें कलाग्राम में नॉर्दर्न सेंटर पर ढोल बजाने वालों के पास लेकर गए और ढोल सिखाने की अपील की लेकिन ढोल वालों ने लड़की को देखकर ढोल सिखाने से मना कर दिया। बड़ी मुश्किल से एक सरदार जी ने ढोल बजाना सिखाया। उसके बाद उन्होंने इंटरनेशनल ट्रेड एक्स चंडीगढ़ में प्रस्तुति दी जहां सतिंदर सरताज सहित कई बड़े लोग मौजूद थे। उन्होंने ढोल से ऐसा समा बांधा की सतिंदर सरताज भी खुद को नहीं रोक पाए और नाचने लगे। उसके बाद कारवां बढ़ता गया।
 

शबद कीर्तन से निहाल कर रहीं सगी बहनें अर्शजोत और सिमरजोत कौर
सेक्टर-21 निवासी अर्शजोत कौर और सिमरजोत कौर जब कीर्तन करती हैं तो हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। खास बात यह है कि दोनोंग बहने हैं और अपनी सुर सरिता के कारण परिवार, माता-पिता और शहर का मान बढ़ा रहीं हैं।



अर्शजोत 12वीं और सिमरजोत कौर 10वीं में पढ़ती हैं। अर्शजोत ने तीसरी कक्षा से ही सेक्टर-34 के गुरुद्वारा साहिब में गुरमत संगीत सीखना शुरू किया था और सिमरजोत पहली कक्षा से ही गुरुद्वारे जाने लगी थी। पिता गुरिंदर बीर सिंह हैप्पी व्यवसायी व समाजसेवी हैं और माता नीलम कौर हिंदी की अध्यापिका। दोनों का कहना है कि बेटियां हमारा अभिमान हैं।

कीर्तन सीखने के बाद विशेष आयोजनों में दोनों बहनें कीर्तन करती हैं। सेक्टर-34 के गुरुद्वारा साहिब, 20 के गुरुद्वारा साहिब के अलावा सेक्टर-22 के गुरुद्वारा साहिब में भी दोनों कीर्तन करने जाती हैं। अर्शजोत का कहना है कि कोविड के दौरान सेक्टर-32 के सरकारी स्कूल में शबद गायन की ऑनलाइन प्रतियोगिता में उन्होंने पहला स्थान हासिल किया था। वह 12वीं में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान के अलावा संगीत की भी पढ़ाई कर रहीं हैं।
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