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सिर्फ स्वाद ही नहीं, अब पानी को भी शुद्ध बनाएगा ड्रमस्टिक
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 16 Dec 2017 04:58 PM IST
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पानी
- फोटो : File Photo
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साउथ से आकर देश के कई हिस्सों में मुंह का स्वाद बन चुके सांभर में जो ड्रमस्टिक का इस्तेमाल होता है, वह सिर्फ सांभर को टेस्टी बनाने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि
ड्रमस्टिक से अब पानी को शुद्ध करने का काम किया जा रहा है। ड्रमस्टिक में इतने मिनर्लस हैं कि इसके पाउडर से पानी के बेक्टीरिया को खत्म कर उसे पीने लायक बनाया जा सकता है। यह रिसर्च हाल ही में हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित शूलिनी यूनिवर्सिटी में की गई है। इस रिसर्च को आगे बढ़ाते हुए अब पानी में मौजूद मेटल को खत्म
करने पर काम चल रहा है।
दरअसल, शूलिनी यूनिवर्सिटी ने एक साथ 101 पेटेंट के लिए आवेदन किया था और यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने दावा किया है कि उनके आवेदन स्वीकार हो गए हैं। ड्रमस्टिक पर
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रिसर्च भी इसका एक हिस्सा है। इसके अलावा फ्लाइंग चेयर को अवार्ड भी मिल चुका है। यूनिवर्सिटी के छात्रों ने एक फ्लाइंग चेयर बनाई थी, जो भीड़-भाड़ वाले इलाके से
मरीज को अस्पताल तक लेकर जाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।
यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. पीके खोसला ने बताया कि सबसे अधिक पेटेंट्स जमा करानेवाला संस्थान शूलिनी बन गया है। यूनिवर्सिटी के पेटेंट सेल को संयुक्त रूप से हिमाचल प्रदेश राज्य विज्ञान प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद और प्रोद्योगिकी विभाग से अवार्डमिलने का भी दावा किया गया है। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कमल देव के मुताबिक नैनो तकनीक पर भी काम किया जा रहा है। लंबे समय तक एंटी बायेटिक दवा खाने से बचने के लिए भी रिसर्च की जा रही है।
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ड्रमस्टिक से अब पानी को शुद्ध करने का काम किया जा रहा है। ड्रमस्टिक में इतने मिनर्लस हैं कि इसके पाउडर से पानी के बेक्टीरिया को खत्म कर उसे पीने लायक बनाया जा सकता है। यह रिसर्च हाल ही में हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित शूलिनी यूनिवर्सिटी में की गई है। इस रिसर्च को आगे बढ़ाते हुए अब पानी में मौजूद मेटल को खत्म
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करने पर काम चल रहा है।
दरअसल, शूलिनी यूनिवर्सिटी ने एक साथ 101 पेटेंट के लिए आवेदन किया था और यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने दावा किया है कि उनके आवेदन स्वीकार हो गए हैं। ड्रमस्टिक पर
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रिसर्च भी इसका एक हिस्सा है। इसके अलावा फ्लाइंग चेयर को अवार्ड भी मिल चुका है। यूनिवर्सिटी के छात्रों ने एक फ्लाइंग चेयर बनाई थी, जो भीड़-भाड़ वाले इलाके से
मरीज को अस्पताल तक लेकर जाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।
यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. पीके खोसला ने बताया कि सबसे अधिक पेटेंट्स जमा करानेवाला संस्थान शूलिनी बन गया है। यूनिवर्सिटी के पेटेंट सेल को संयुक्त रूप से हिमाचल प्रदेश राज्य विज्ञान प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद और प्रोद्योगिकी विभाग से अवार्डमिलने का भी दावा किया गया है। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कमल देव के मुताबिक नैनो तकनीक पर भी काम किया जा रहा है। लंबे समय तक एंटी बायेटिक दवा खाने से बचने के लिए भी रिसर्च की जा रही है।