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सहजधारियों को वोटिंग का हक दिलाने के लिए अभियान शुरू, हाईकोर्ट में अपील
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 27 May 2017 12:48 PM IST
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एसजीपीसी
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सहजधारी सिखों के मताधिकार को खत्म करने के लिए सिख गुरुद्वारा एक्ट 1925 में किए गए संशोधन को रद्द करने की अपील की गई है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) चुनाव में वोटिंग के हक को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस संशोधन के चलते 70 लाख सहजधारियों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया है, जो गलत है।
याचिका पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार सहित पंजाब सरकार व अन्य को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं। सहजधारी सिख पार्टी की ओर से उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष परमजीत सिंह राणु ने जनहित याचिका दायर कर बताया कि 1925 में सिख गुरुद्वारा एक्ट बनाया गया था। 1944 में सिख धर्म में आस्था रखने वालों की संख्या पर गौर करते हुए इस एक्ट में संशोधन कर इसमें सहजधारी सिख शब्द को शामिल कर लिया गया और उन्हें भी एसजीपीसी के बोर्ड और कमेटी के चुनाव में मताधिकार दे दिया गया।
2003 में राजनीतिक कारणों के चलते और बिना किसी प्रक्रिया का पालन किए ही एक्ट में से सहजधारी शब्द को अलग करते हुए नोटिफिकेशन जारी कर सहजधारी सिखों को एसजीपीसी के बोर्ड और कमेटी के लिए होने वाले चुनाव में मताधिकार से वंचित कर दिया गया। इसके खिलाफ याचिका दाखिल कर सहजधारी सिखों को मताधिकार से वंचित करने को चुनौती दी गई।
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याचिका पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार सहित पंजाब सरकार व अन्य को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं। सहजधारी सिख पार्टी की ओर से उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष परमजीत सिंह राणु ने जनहित याचिका दायर कर बताया कि 1925 में सिख गुरुद्वारा एक्ट बनाया गया था। 1944 में सिख धर्म में आस्था रखने वालों की संख्या पर गौर करते हुए इस एक्ट में संशोधन कर इसमें सहजधारी सिख शब्द को शामिल कर लिया गया और उन्हें भी एसजीपीसी के बोर्ड और कमेटी के चुनाव में मताधिकार दे दिया गया।
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2003 में राजनीतिक कारणों के चलते और बिना किसी प्रक्रिया का पालन किए ही एक्ट में से सहजधारी शब्द को अलग करते हुए नोटिफिकेशन जारी कर सहजधारी सिखों को एसजीपीसी के बोर्ड और कमेटी के लिए होने वाले चुनाव में मताधिकार से वंचित कर दिया गया। इसके खिलाफ याचिका दाखिल कर सहजधारी सिखों को मताधिकार से वंचित करने को चुनौती दी गई।
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31 मई 2005 को एसजीपीसी के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई
एसजीपीसी प्रधान
इसी बीच केंद्र ने 31 मई 2005 को एसजीपीसी के चुनाव की प्रक्रिया शुरू कर दी। हाईकोर्ट ने कहा था कि चुनाव इस याचिका के अंतिम फैसले पर निर्भर होंगे। इस मामले को 3 जजों की फुल बेंच के पास भेजा गया और इसी बीच 2011 के एसजीपीसी कार्यकारिणी का कार्यकाल पूरा होते ही दोबारा चुनाव करवा लिए गए। फिर से इसे हाईकोर्ट की फुल बेंच के फैसले पर निर्भर कर दिया गया।
दिसंबर 2011 को फुल बेंच ने 2003 की नोटिफिकेशन को अवैध करार देते हुए सहजधारी सिखों के हक में फैसला सुनाया था। फुल बेंच के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी गई। इसके बाद गत वर्ष गुरुद्वारा एक्ट में ही संशोधन कर सहजधारी सिखों को मताधिकार से फिर वंचित कर दिया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि केंद्र सरकार ने यह संशोधन सिर्फ शिरोमणि अकाली दल (बादल) को पंजाब में विधानसभा चुनाव से पूर्व राजनीतिक फायदा लेने के लिए किया था, जिसके लिए कोई भी तथ्य और आंकड़े नहीं दिए गए।
लिहाजा, अब जनहित याचिका दायर कर एक्ट में किए गए इस संशोधन को रद्द कर सहजधारी सिखों के मतदान के अधिकार को बहाल करके नए सिरे से चुनाव करवाने की मांग की गई है। याची ने कहा कि कोर्ट की फुल बेंच के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज नहीं किया था और ऐसे में यह आज भी कायम है। एसजीपीसी का कार्यकाल गत वर्ष दिसंबर में समाप्त हो चुका है। ऐसे में अब इस संशोधन को रद्द कर नए सिरे से सहजधारी सिखों को मताधिकार देकर चुनाव करवाए जाने की मांग की गई है।
दिसंबर 2011 को फुल बेंच ने 2003 की नोटिफिकेशन को अवैध करार देते हुए सहजधारी सिखों के हक में फैसला सुनाया था। फुल बेंच के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी गई। इसके बाद गत वर्ष गुरुद्वारा एक्ट में ही संशोधन कर सहजधारी सिखों को मताधिकार से फिर वंचित कर दिया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि केंद्र सरकार ने यह संशोधन सिर्फ शिरोमणि अकाली दल (बादल) को पंजाब में विधानसभा चुनाव से पूर्व राजनीतिक फायदा लेने के लिए किया था, जिसके लिए कोई भी तथ्य और आंकड़े नहीं दिए गए।
लिहाजा, अब जनहित याचिका दायर कर एक्ट में किए गए इस संशोधन को रद्द कर सहजधारी सिखों के मतदान के अधिकार को बहाल करके नए सिरे से चुनाव करवाने की मांग की गई है। याची ने कहा कि कोर्ट की फुल बेंच के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज नहीं किया था और ऐसे में यह आज भी कायम है। एसजीपीसी का कार्यकाल गत वर्ष दिसंबर में समाप्त हो चुका है। ऐसे में अब इस संशोधन को रद्द कर नए सिरे से सहजधारी सिखों को मताधिकार देकर चुनाव करवाए जाने की मांग की गई है।