मातृ दिवस: कोरोना काल में दी मातृत्व व फर्ज की परीक्षा...इन माताओं के जज्बे को सलाम
वह कहती हैं कि आजकल कोरोना संक्रमित बढ़ने से नाजुक दौर चल रहा है। लेकिन हमें कोरोना से जंग जीतनी ही होगी। सीमा ने बताया कि उनके पति विनोद डीएवी स्कूल में अध्यापक हैं। उनका बड़ा बेटा आदित्य साढ़े 9 साल का है और चौथी क्लास में पढ़ता है। जबकि बेटी अक्षरा साढ़े 4 साल की है और केजी में पढ़ती है।
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इको सिटी मुल्लांपुर निवासी सीमा चंडीगढ़ पुलिस में तैनात हैं। वह कोविड में फ्रंटलाइन वॉरियर्स के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं। साथ ही अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां भी निभा रही हैं। हालांकि कोरोना काल में उनकी पुलिस की ड्यूटी और मातृत्व दोनों को लेकर परीक्षा हुई। लेकिन उन्होंने दोनों जगह बराबर संतुलन बनाए रखा। जबकि उनकी मुश्किलें कम नहीं थी और वह एक साल में दो बार कोरोना का शिकार हो चुकी है। इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
वह कहती हैं कि आजकल कोरोना संक्रमित बढ़ने से नाजुक दौर चल रहा है। लेकिन हमें कोरोना से जंग जीतनी ही होगी। सीमा ने बताया कि उनके पति विनोद डीएवी स्कूल में अध्यापक हैं। उनका बड़ा बेटा आदित्य साढ़े 9 साल का है और चौथी क्लास में पढ़ता है। जबकि बेटी अक्षरा साढ़े 4 साल की है और केजी में पढ़ती है।
जब कोरोना ने दस्तक दी थी तो वह समय उनके लिए काफी मुश्किल का था। पुलिस ड्यूटी के दौरान न चाहते हुए भी लोगों के बीच जाना पड़ता था। वहीं मन में डर बना रहता था कि वह खुद ही यह बीमारी अपने घर न ले जाएं, घर पर छोटे बच्चे हैं, हमारी किसी गलती के कारण वह संक्रमित न हो जाएं। हालांकि घर में पति बच्चों की देखरेख करते थे।
कोरोना महामारी से पहले जब वह ड्यूटी से घर जाती थी तो बच्चे दौड़कर गले लग जाते थे। लेकिन कोरोना काल में यह सभी चीजें खत्म हो गई हैं। पहले अक्तूबर 2020 में कोरोना पॉजिटिव हुई तो उस समय करीब एक महीना बच्चों से दूर रही और वह समय मेरे लिए सबसे ज्यादा कठिन था। पति ने बच्चों को संभाला।
सीमा ने बताया कि कोरोना वैक्सीन की दोनों दो डोज ले रखी हैं। लेकिन अभी भी मैं और पति दोनों कोरोना संक्रमित हैं। हम दोनों बच्चों से अलग दूसरे कमरे में रहते हैं। हमारे पड़ोस में हमारे रिश्तेदार हैं जो बच्चों के लिए खाना-पीना देकर जाते हैं। इस संकट के दौर में हमें एक दूसरे से ही प्रेरणा मिलती है और कोरोना से जंग जारी है। कोरोना पर जीत जरूर हासिल करेंगे।
आठ माह के बच्चे से दूर रहकर संक्रमितों की देखरेख कर निभाई कोरोना से जंग में ड्यूटी
अगर बॉर्डर पर जंग छिड़ी हो तो फौजी को जाकर मोर्चा संभालना ही पड़ता है। कोरोना महामारी के दौरान डॉ. जैसमीन की हालत भी बिल्कुल एक फौजी जैसी ही थी। जब उनका बेटा महीप मात्र आठ महीने का था, उसी दौरान एक डॉक्टर होने के नाते उनकी कोरोना महामारी से लोगों को बचाने की जिम्मेदारी भी बढ़ी गई थी। ऐसे में उनके परिवार में पति सरदार गुरालम सिंह, ससुर और ननद की मदद से ड्यूटी पर जाकर उन्होंने कोरोना संक्रमितों का इलाज करने के लिए मोर्चा संभाला।
कई पल ऐसे भी आए कि वह अपने छोटे बच्चे को गले लगाए बिना ही ड्यूटी पर गई। अब सपना एक ही है कि इस महामारी से देश को जल्द निजात मिले। डॉ. जैसमीन कौर ने लोगों से अपील की है कि वह कोरोना गाइडलाइन का पालन करें, ताकि हमारी मेहनत कामयाब हो पाए। मेरी जिंदगी में लोगों की सेवा करना और मातृत्व धर्म निभाना दोनों ही जरूरी था। बेटे महीप के बचपन के साथ मुझे यह कोरोना काल भी हमेशा याद रहेगा।