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स्टेशन पर मिला कुछ ऐसा जिससे छूट गए पुलिस के पसीने, अब बढ़ाई गई चौकसी

Sat, 08 Apr 2017 01:21 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब)
ब्यूरो/अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब) Updated Sat, 08 Apr 2017 01:21 AM IST
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security tight in atari station
अटारी, अमृतसर रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा बढ़ी
भारत और पाकिस्तान के बीच रेल सेवा को लेकर इन दिनों पुलिस के पसीने छूट रहे हैं। स्टेशन पर चौकसी बढ़ाई गई है। क्योंकि अमृतसर -लाहौर रेलवे ट्रैक पर ट्रैक के पास वीरवार की रात बम का खोल मिला। जिसके बाद पुलिस के हाथ पांव फूल गए। भारत-पाकिस्तान के बीच इस ट्रैक से गुजरने वाली दिल्ली-अटारी स्पेशल ट्रेन की भी सुरक्षा बढ़ा दी है। आतंकियों के निशाने पर अंतरराष्ट्रीय अटारी रेलवे स्टेशन व अमृतसर रेलवे स्टेशन होने के नाते सुरक्षा दस्ते अब बीच के दोनों रेलवे स्टेशनों छेहरटा की निगहबानी कर रहे हैं। 
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पुलिस कमिश्नर जे नागेश्वर राव के पास वीरवार की रात सूचना आई कि अमृतसर-लाहौर रेलवे ट्रैक पर बम देखा गया है। उन्होंने तुरंत डीसीपी की अगुवाई में बम स्क्वायड की टीम मौके पर भेजी। करीब आधे घंटे बाद टीम ने कहा कि बम का खाली खोल है। खोल की लंबाई करीब नौ इंच व चौड़ाई करीब 15 इंच थी। मौके पर पहुंचे डीसीपी अमरजीत सिंह बाजवा बताया बम का खोल था। साथ ही प्रताप मिल है।
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पहले भी खाली बम के 11 खोल आसपास इलाकों में मिले हैं। भारत-पाक जंग के दौरान छेहरटा रेलवे स्टेशन के आसपास कई बम गिरे थे, राकेट लॉचर का इस्तेमाल होता रहा है। कहीं न कहीं पुराने अवशेष मिल ही जाते हैं। घबराने की कोई बात नहीं है। बम का खोल है। वह भी जंग लगा हुआ। जीआरपी थाना प्रभारी सुखदेव सिंह ने बताया अटारी रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं। वहीं खासा व छेहरटा में भी सुरक्षा बढ़ाई गई है। 
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कबाड़ी खरीद लेते हैं बम का खोल

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अटारी, अमृतसर रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा बढ़ी
थाना सुल्तानविंड पुलिस को अक्टूबर 2016 में को चाटीविंड नहर के पास एक बोरे में बम के कई खोल मिले थे। आनन-फानन में इलाका सील कर दिया गया। इन बम के खोल के साथ एक-दो बम ऐसे थे जो फ्यूज नहीं थे, जिन्हें जब नष्ट किया गया तो कई धमाके हुए थे। इस प्रक्रिया में तीन दिन लगे थे। पुलिस जांच में आया कि यह बम के खोल कबाड़ी ने छावनी क्षेत्र से खरीदे थे।

अमृतसर, छेहरटा व खासा रेलवे स्टेशनों के पास भारत-पाकिस्तान जंग के समय हथियारों का जखीरा रखा जाता है। मोर्चे बनते हैं। इसके चलते कई बार जंग के अवशेष मिलते ही रहते हैं। चार साल पहले रानिके गांव के पास एक अध्यापक के खेत में जुताई के समय राकेट लॉचर मिला था, जिसे जंग लग चुका था। अधिकांश कबाड़ी लोहे के चक्कर में बम खरीदने में भी नहीं हिचकते।
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