क्या टूट जाएगा 24 साल पुराना भाजपा-अकाली गठबंधन, नेताओं की बयानबाजी से उपजा मतभेद
- सीएए के बाद अकाली दल ने एमएसपी संबंधी इरादे पर जताया विरोध।
- विधायक गुरप्रताप सिंह वढाला ने नोटबंदी पर भी उठाए सवाल।
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भाजपा के वरिष्ठ नेता मदन मोहन मित्तल के सीट बंटवारे वाले बयान के बाद अकाली दल और भाजपा के बीच दशकों पुराने गठबंधन का किला तेजी से दरकने लगा है। बीते दिनों पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के सीएए पर दिए बयान के बाद मंगलवार को अकाली विधायक गुरप्रताप सिंह वढाला ने न सिर्फ केंद्र सरकार द्वारा फसलों का एमएसपी सिस्टम रद्द करने की तैयारी की तीखी आलोचना की, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लागू की गई नोटबंदी को भी पंजाब के किसानों के लिए घातक करार दिया।
उन्होंने कहा कि नोटबंदी का बुरा असर हर क्षेत्र पर हुआ है। इसने खासकर किसानों की कमर तोड़ दी है। इससे पहले अकाली दल दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के लिए उसकी नीतियों को जिम्मेदार ठहरा चुका है।
वढाला ने कहा कि अगर किसानों के हितों के लिए अपने गठजोड़ की पार्टी के खिलाफ भी प्रदर्शन करना पड़े तो पार्टी को ऐसा विरोध प्रदर्शन जरूर करना चाहिए। पंजाब के किसान ही देश को सरप्लस अनाज की स्थिति में लाए हैं। अब जब अनाज सरप्लस हो गया है तो फसल खरीद का एमएसपी सिस्टम खत्म करना पूरी तरह गलत होगा।
दिल्ली चुनाव से हुई मतभेद की शुरुआत
अकाली दल और भाजपा के बीच हाल के मतभेद की शुरुआत दिल्ली विधानसभा चुनाव से हुई। भाजपा द्वारा अकाली दल को कोई सीट नहीं दी गई। इस पर अकाली दल ने दिल्ली चुनाव में हिस्सा नहीं लिया और जैसे ही भाजपा वहां हारी, अकाली दल ने हार का ठीकरा उसी के सिर फोड़ने में देर नहीं की।
इसके बाद अगला वार भाजपा की ओर से सीनियर नेता मदन मोहन मित्तल का रहा। उन्होंने कहा कि भाजपा 2022 के पंजाब चुनाव में 117 में से 59 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने अकाली दल के साथ सीट बंटवारा 50:50 के हिसाब से करने पर जोर दिया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पार्टी के नेता व कार्यकर्ता पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं।
इस पर आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को भी मैदान में उतरना पड़ा और उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठा दिए। खास बात यह है कि गठबंधन में रहते हुए अकाली दल अब तक भाजपा की नीतियों का पुरजोर समर्थन करता रहा था।
24 साल पुराना है अकाली-भाजपा गठबंधन
प्रकाश सिंह बादल अकसर यह कहते रहे हैं कि अकाली दल और भाजपा का रिश्ता नाखून और मांस का है। देश में गठबंधन और महागठबंधनों के कई सियासी दौर में भी यह गठबंधन कायम रहा और दोनों दलों को सियासी नफा-नुकसान कभी प्रभावित नहीं कर सका।
देश में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान अविभाजित पंजाब में सिखों का प्रतिनिधित्व करने वाले अकाली दल की सियासी गठबंधन की शुरुआत 1969 में हुई जब पहली बार मुख्यमंत्री चुने जाने पर प्रकाश सिंह बादल ने जनसंघ (आज भाजपा) की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। हालांकि यह दोस्ती 1996 में परवान चढ़ी और पंजाब को स्थिर सरकार देने का दावा करते हुए शिअद-भाजपा गठबंधन अस्तित्व में आया।
1999 के लोकसभा और 2002 के विधानसभा चुनाव में पंजाब में गठबंधन का प्रदर्शन खराब रहा। इसके बाद दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी शुरू हुए, जिनसे लगने लगा कि यह गठबंधन टूट जाएगा। लेकिन दोनों ही दल खराब स्थिति के बावजूद गठबंधन धर्म पर कायम रहे।
इसके बाद 2014 लोकसभा चुनाव में पंजाब की 13 में से छह सीटें जीतकर गठबंधन ने 35 फीसदी वोट हासिल किए और कांग्रेस तीन सीटों पर सिमट गई। 2017 में विधानसभा चुनाव में भी शिअद-भाजपा गठबंधन का प्रदर्शन फिर खराब रहा और उसे मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी नहीं मिल सका। राज्य में उसका वोट प्रतिशत करीब 31 फीसदी दर्ज हुआ था।