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टैगोर में सांग उत्सव के तीसरे दिन सेठ ताराचंद की कहानी
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 18 Jun 2016 07:56 PM IST
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चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में सांग उत्सव का आयोजन
- फोटो : अमर उजाला
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चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में चल रहे 8 दिवसीय सांग उत्सव के तीसरे दिन सेठ ताराचंद की कहानी का मंचन किया गया। उत्सव का आयोजन सूचना जनसंपर्क एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग, हरियाणा की ओर से किया जा रहा है। पंडित लख्मी चंद की रचना और मोहन के निर्देशन में ताराचंद सांग को पेश किया गया। कहानी में दिखाया गया कि दिल्ली का सेठ ताराचंद अपने चाचा के बेटे हरिराम की सीख मानकर धर्म का त्याग कर देता है। जिससे तारा चंद के परिवार पर बुरा असर पड़ता है और उसे एक समय का खाना नसीब नही हो पाता।
वह अपने बेटे चंद्रगुप्त को मनसा सेठ के पास दौ सौ रुपये में गिरवी रख देता हैं। एक दिनचंद्रगुप्त को मंगलद्वीप में रुई का व्ययपार करने केलिए भेज देता है। वहां उसकी शादी वहीं के व्ययपारी की बेटी धर्म मालकी के साथ हो जाती है। व्ययपार करने के बाद चंद्रगुप्त धर्म मालकी को वापिस ला रहा होता है तो रास्ते में एक टापू आता है वहां पर विश्राम करते है। उसकी पत्नी धर्म मालकी की आंख लग जाती है। तब चंद्रगुप्त सोचता है कि मनसा सेठ यह न समझे कि रुई के व्ययपार से जो मुनाफा हुआ उसी से शायद चंद्रगुप्त ने शादी कर ली।
यह सोचकर वह सोई हुई अपनी पत्नी को वहीं छोडकर वापिस आ जाता हैं। जब पत्नी सो कर उठती है तो अपने पति का वहां न पाकर घबरा जाती है। वह पति को ढूढ़ने के लिए साघू का भेष बनाकर दिल्ली पंहुच जाती है। शहर में यह बात फैल जाती है कि( धर्म मालकी जोकि साधु केभेष में थी) बहुत बड़ा महात्मा है। सेठ ताराचंद का पता चलता है तो वह साघू के पास जाता है और अपना दुख बताता है। वह ताराचंद को पहचान लेती है कि यह मेरा ससुर है।
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वह ताराचंद को एक सोने का कंगन देती है। जिसे बेचकर वह गिरवी रखे अपने बेटे चंद्रगुप्त को छुड़वाकर वापिस घर ले आता है। ताराचंद अपने बेटे चंद्रगुप्त को उस साघू से मिलने ले जाता है। वहां पर धर्म मालकी जो साघू के भेष में थी आपने असली रुप में आ जाती है। इसके बाद चंद्रगुप्त शर्मिंदा होकर माफी मांग लेता है और धर्म मालकी को अपनी पत्नी मानकर साथ रहने लगता है।
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वह अपने बेटे चंद्रगुप्त को मनसा सेठ के पास दौ सौ रुपये में गिरवी रख देता हैं। एक दिनचंद्रगुप्त को मंगलद्वीप में रुई का व्ययपार करने केलिए भेज देता है। वहां उसकी शादी वहीं के व्ययपारी की बेटी धर्म मालकी के साथ हो जाती है। व्ययपार करने के बाद चंद्रगुप्त धर्म मालकी को वापिस ला रहा होता है तो रास्ते में एक टापू आता है वहां पर विश्राम करते है। उसकी पत्नी धर्म मालकी की आंख लग जाती है। तब चंद्रगुप्त सोचता है कि मनसा सेठ यह न समझे कि रुई के व्ययपार से जो मुनाफा हुआ उसी से शायद चंद्रगुप्त ने शादी कर ली।
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यह सोचकर वह सोई हुई अपनी पत्नी को वहीं छोडकर वापिस आ जाता हैं। जब पत्नी सो कर उठती है तो अपने पति का वहां न पाकर घबरा जाती है। वह पति को ढूढ़ने के लिए साघू का भेष बनाकर दिल्ली पंहुच जाती है। शहर में यह बात फैल जाती है कि( धर्म मालकी जोकि साधु केभेष में थी) बहुत बड़ा महात्मा है। सेठ ताराचंद का पता चलता है तो वह साघू के पास जाता है और अपना दुख बताता है। वह ताराचंद को पहचान लेती है कि यह मेरा ससुर है।
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वह ताराचंद को एक सोने का कंगन देती है। जिसे बेचकर वह गिरवी रखे अपने बेटे चंद्रगुप्त को छुड़वाकर वापिस घर ले आता है। ताराचंद अपने बेटे चंद्रगुप्त को उस साघू से मिलने ले जाता है। वहां पर धर्म मालकी जो साघू के भेष में थी आपने असली रुप में आ जाती है। इसके बाद चंद्रगुप्त शर्मिंदा होकर माफी मांग लेता है और धर्म मालकी को अपनी पत्नी मानकर साथ रहने लगता है।