कोरोना से बचाव में एंटीबॉडीज का अहम रोल नहीं, मुंबई के हेल्थ वर्करों पर शोध से खुलासा
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कोरोना से बचाव को लेकर एंटीबॉडीज को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध से चौंकाने वाली बात सामने आई है। पीजीआई कम्युनिटी मेडिसिन, मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल व फोर्टिस रिसर्च इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों द्वारा किए गए शोध से इस बात की पुष्टि होती है कि कोरोना के संक्रमण से बचाव में एंटीबॉडीज का अहम रोल नहीं है।
मुंबई के 801 हेल्थ केयर वर्करों पर किए गए शोध से यह पता चला है कि एंटीबॉडीज हमारे शरीर में 50 दिन से ज्यादा नहीं रहता है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि कोरोना से बचाव में एंटीबॉडीज सहायक है, सही साबित नहीं होता। क्योंकि शोध में शामिल संक्रमित मरीजों में एंटीबॉडीज समाप्त हो जाने के बाद भी दोबारा कोई मरीज संक्रमित नहीं मिला।
इन्होंने किया शोध
पीजीआई कम्युनिटी मेडिसिन के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तरुणदीप, हिंदुजा हॉस्पिटल मुंबई के डॉ. निशांत कुमार और फोर्टिस रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. शिबल भारतीय ने मिलकर यह शोध किया है। इसका प्रकाशन साइंस डायरेक्ट में नवंबर अंक में किया गया।
ऐसे किया शोध
इस शोध में मुंबई के 801 ऐसे हेल्थ केयर वर्कर को शामिल किया गया जो कोरोना संक्रमित और ठीक हैं। इनमें महिलाओं की संख्या 11.1 फीसदी और पुरुषों की संख्या 13.5 फीसदी थी। सर्वे के दौरान तीन अलग-अलग समय पर उनमें एंटीबॉडीज की स्थिति का आंकलन किया गया। इसके बाद यह बात सामने आई कि 50 दिन के बाद शरीर में एंटीबॉडी समाप्त हो जाते हैं। शोध के दौरान 801 हेल्थ केयर वर्कर में से 90 प्रतिशत में 28 दिन एंटीबॉडीज मिले जबकि 10 प्रतिशत में नहीं।
दूसरे क्रम में उन मरीजों में 29 से 42 दिन के बीच में दोबारा एंटीबॉडीज की जांच की गई। इसमें 38 प्रतिशत में ही एंटीबॉडीज पाया गया। तीसरे क्रम में 50वें दिन उन मरीजों में एंटीबॉडीज की जांच फिर की गई। इस दौरान किसी में भी एंटीबॉडीज नहीं मिला। तीन अलग-अलग चरणों में किए गए एंटीबॉडीज जांच से यह बात पुष्ट हुई कि भारतीयों के शरीर में 50 दिन तक ही एंटीबॉडीज सक्रिय रहता है। ऐसे में कोरोना से बचाव में एंटीबॉडीज की प्रधानता को मानना उचित नहीं होगा।
सेल इम्युनिटी का महत्वपूर्ण रोल
विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों की एंटीबॉडीज जांच के परिणाम से यह बात सामने आई कि संक्रमण से बचाव में खून में पाई जाने वाली एंटीबॉडीज का भले ही कोई रोल न हो, लेकिन सेल इम्युनिटी बेहद महत्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि सेल में पाई जाने वाली रोग प्रतिरोधक क्षमता ने उन पॉजिटिव मरीजों को दोबारा संक्रमित होने से बचाया, लेकिन इस सेल इम्युनिटी की क्षमता के बारे में अब तक कोई शोध नहीं किया गया है।
टीकाकरण में एंटीबॉडीज के रोल को बताया जा रहा बेहद खास
कोरोना से बचाव के लिए होने वाले टीकाकरण में एंटीबॉडीज के रोल को बेहद खास बताया जा रहा है। देशभर में किए जा रहे ह्यूमन ट्रायल में भी ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जो पॉजिटिव नहीं है। ऐसी स्थिति में एक तरफ एंटीबॉडीज की बात की जा रही है जो पॉजिटिव होने के बाद बॉडी में डेवलप होता है। वहीं दूसरी तरफ ट्रायल में शामिल लोगों के संक्रमण रहित होने से दोनों बातें अलग-अलग दिशा में जा रही हैं।
ऐसे में इस शोध में वैक्सीन को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। शोध में शामिल विशेषज्ञों का कहना है कि परिणाम के आधार पर यह तो तय है कि कोरोना से बचाव में एंटीबॉडीज का रोल खास नहीं है। ऐसी स्थिति में जिस वैक्सीन को देकर कोरोना से बचाव की बात की जा रही है, वह कितने दिनों तक शरीर में एंटीबॉडीज के बल पर संक्रमण से बचाव कर पाएगा या भी शोध का विषय है।
इस शोध से इस बात की पुष्टि हुई है कि भारतीयों के शरीर में एंटीबॉडीज 50 दिनों तक ही रहता है। अलग-अलग लोगों में इसकी समय सीमा अलग हो सकती है। लेकिन अवधि 50 दिन से ज्यादा नहीं हो सकती। शोध के परिणाम से यह बात सामने आई है कि कोरोना से बचाव में एंटी बॉडीज का महत्वपूर्ण रोल नहीं है। सेल इम्युनिटी बचाव में मददगार साबित हो रही है, लेकिन इस पर पुष्ट रिसर्च नहीं हुआ है। - डॉ. तरुणदीप, असिस्टेंट प्रोफेसर, पीजीआई कम्युनिटी मेडिसिन