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गुलजार विशेषः ख्याल को कागज में दफन किया, नज्म ने आंखें खोलीं
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 25 Aug 2016 11:58 AM IST
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चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में गीतकार गुलजार
- फोटो : अमर उजाला
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चंडीगढ़ स्थित टैगोर थियेटर में एक शाम गुलजार के नाम रोशन हुई और खचाखच भरे ऑडिटोरियम में इस महान शायर का स्टारडम भी साफ नजर आया। पंजाब के राज्यपाल और शहर के प्रशासक बीपी सिंह बदनौर सिर्फ जानकारी मिलने पर ही उन्हें सुनने के लिए आ पहुंचे। शहर और प्रशासन की सभी नामचीन हस्तियां वहां मौजूद थीं।
कई शख्सियतों ने सीट ने मिल पाने पर सभागार की सीढ़ियों पर बैठकर इस गीतकार को सुना। मौका था पंजाब साहित्य अकादमी और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के साझा कार्यक्रम एक शाम गुलजार के नाम का। मंच पर सवालों के जरिए गुलजार के भीतर के कलाकार से रूबरू करा रहे थे, कवि, साहित्यकार और चंडीगढ़ पुलिस के आईजी तजेंदर सिंह लूथरा।
जब गुलजार से सवाल किया गया कि आपकी नज्म कैसे पैदा होती है तो उनका जवाब उनकी ही यह नज्म थी, ‘ख्याल को कागज में दफन किया, नज्म ने आंखें खोलीं...।’ गालिब ही नहीं गुलजार का भी अंदाज-ए-बयां अलग है। और हो भी क्यों न, वह गालिब को अपना चचा जान जो मानते हैं। अपने गीतों में गालिब के शेयरों के इस्तेमाल को वह अपना हक मानते हैं।
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वह कहते हैं कि यह चचा की जेब में हाथ डालकर थोड़ी मूंगफली निकाल लेने का हक है। अगर मैं ऐसा नहीं कर सकता तो फिर वह काहेके चचा। गुलजार की गजल और नज्मों में मायनों की परतें हैं।
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कई शख्सियतों ने सीट ने मिल पाने पर सभागार की सीढ़ियों पर बैठकर इस गीतकार को सुना। मौका था पंजाब साहित्य अकादमी और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के साझा कार्यक्रम एक शाम गुलजार के नाम का। मंच पर सवालों के जरिए गुलजार के भीतर के कलाकार से रूबरू करा रहे थे, कवि, साहित्यकार और चंडीगढ़ पुलिस के आईजी तजेंदर सिंह लूथरा।
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जब गुलजार से सवाल किया गया कि आपकी नज्म कैसे पैदा होती है तो उनका जवाब उनकी ही यह नज्म थी, ‘ख्याल को कागज में दफन किया, नज्म ने आंखें खोलीं...।’ गालिब ही नहीं गुलजार का भी अंदाज-ए-बयां अलग है। और हो भी क्यों न, वह गालिब को अपना चचा जान जो मानते हैं। अपने गीतों में गालिब के शेयरों के इस्तेमाल को वह अपना हक मानते हैं।
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वह कहते हैं कि यह चचा की जेब में हाथ डालकर थोड़ी मूंगफली निकाल लेने का हक है। अगर मैं ऐसा नहीं कर सकता तो फिर वह काहेके चचा। गुलजार की गजल और नज्मों में मायनों की परतें हैं।
आवाम ने नहीं कहा था, मुल्क को बांट दो
चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में गीतकार गुलजार
- फोटो : अमर उजाला
परत दर परत इनके अर्थ ऐसे ही खुलते हैं, जैसे आकाशगंगा में सितारे बनते हैं। बुधवार शाम खचाखच भरे टैगोर थिएटर में हजारों जेहन इन बनते-टूटते सितारों की रोशनी में नहा कर निहाल थे। इसका श्रेय वह शैलेंद्र को देते हैं।
गुलजार के अनुसार इस सबसे बड़े नगमानिगार से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। शेलेंद्र आवाम के बीच जाते थे और अपने गीतों में उनकी बात कहते थे। आपकी शायरी आपका दर्द न लगे, वह पूरी सोसायटी, पूरे देश का दर्द लगनी चाहिए।
सुबह-सुबह इक ख्वाव की दस्तक में गुलजार ने बंटवारे का अपना दर्द पूरे समाज के साथ बांटा है। पूरे देश के साथ बांटा है। वह कहते हैं, क्योंकि आवाम ने नहीं कहा था कि मुल्क को बांट दो। इसलिए होठों पर वो मीठे गुड़ का जायका अब तक चिपका है...।
गुलजार के अनुसार इस सबसे बड़े नगमानिगार से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। शेलेंद्र आवाम के बीच जाते थे और अपने गीतों में उनकी बात कहते थे। आपकी शायरी आपका दर्द न लगे, वह पूरी सोसायटी, पूरे देश का दर्द लगनी चाहिए।
सुबह-सुबह इक ख्वाव की दस्तक में गुलजार ने बंटवारे का अपना दर्द पूरे समाज के साथ बांटा है। पूरे देश के साथ बांटा है। वह कहते हैं, क्योंकि आवाम ने नहीं कहा था कि मुल्क को बांट दो। इसलिए होठों पर वो मीठे गुड़ का जायका अब तक चिपका है...।
सवालों पर गुलजार ने खूब लीं चुटकियां
चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में गीतकार गुलजार
- फोटो : अमर उजाला
जब उनसे सवाल किया गया कि आप इतने अलग अंदाज में कैसे लिखते हैं तो उनका जवाब था कि कुर्सी पर बैठकर लिखता हूं। इसी तरह उनकी प्रशंसा करते हुए जब आईजी लूथरा ने कहा कि गुलजार साहब का फलक इतना बड़ा है कि यह सबसे बड़ी दुविधा है कि बात कहां से शुरू की जाए।
इस पर गुलजार ने चुटकी ली कि आपकी इस मुश्किल से मुझे हमदर्दी है। जब उनसे पूछा गया कि गीत, गजल और नज्म के बाद त्रिवेणी लिखने की क्या जरूरत आन पड़ी तो उनका कहना था कि मेरे पिता को भी मुझसे यही शिकायत रहती थी कि शायरी करने की क्या जरूरत है।
मगर शायरी जरूरत से तो पैदा नहीं होती। आपने पेले को खेलते देखा। वह गेंद को अपने पैरों, घुटनों और कंधों पर नचाते थे। अब कोई उनसे पूछता कि गोल करने के लिए गेंद को नचाने की क्या जरूरत है...। आप ऐसे ही अपने मन के साथ खेलने लगते हो तो शायरी होती है।
इस पर गुलजार ने चुटकी ली कि आपकी इस मुश्किल से मुझे हमदर्दी है। जब उनसे पूछा गया कि गीत, गजल और नज्म के बाद त्रिवेणी लिखने की क्या जरूरत आन पड़ी तो उनका कहना था कि मेरे पिता को भी मुझसे यही शिकायत रहती थी कि शायरी करने की क्या जरूरत है।
मगर शायरी जरूरत से तो पैदा नहीं होती। आपने पेले को खेलते देखा। वह गेंद को अपने पैरों, घुटनों और कंधों पर नचाते थे। अब कोई उनसे पूछता कि गोल करने के लिए गेंद को नचाने की क्या जरूरत है...। आप ऐसे ही अपने मन के साथ खेलने लगते हो तो शायरी होती है।