{"_id":"57bec1164f1c1b305fd4edb6","slug":"renowned-lyricist-guljar-in-chandigarh-tagore-theatre-special-interview","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"इंटरव्यूः गुलजार बोले, हिन्दी के प्रभाव में उर्दू की स्क्रिप्ट हुई गायब","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
इंटरव्यूः गुलजार बोले, हिन्दी के प्रभाव में उर्दू की स्क्रिप्ट हुई गायब
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 25 Aug 2016 03:28 PM IST
विज्ञापन
पंजाब यूनिवर्सिटी में मशहूर गीतकार गुलजार
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उर्दू की स्क्रिप्ट कम लिखी जा रही है। उर्दू बोली जा रही है, कानों में पड़ रही है लेकिन कहीं दिखाई नहीं दे रही। ये कहना है गुलजार का। उर्दू की स्क्रिप्ट बहुत खूबसूरत होती है, लेकिन उर्दू पर हिंदी का इतना ज्यादा प्रभाव पड़ा कि आज उर्दू में स्क्रिप्ट ही नहीं लिखी जा रही। दूसरा इस पर इलाकाई भाषा का भी काफी प्रभाव पड़ा है। जाने माने लेखक, गीतकार, फिल्मकार और शायर गुलजार बुधवार को पंजाब यूनिवर्सिटी में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे।
गुरुदेव की शायरी को छूना आसान काम नहीं
गुलजार ने रवींद्रनाथ टैगोर की पुस्तकों के अनुवाद के बारे में बताया कि उनकी शायरी को छूना आसान काम नहीं है, लेकिन मैं एक भाषा से दूसरी भाषा में जाना चाहता था। ज्यादातर लेखकों ने टैगोर के इंग्लिश लिटरेचर का अनुवाद किया है, इसलिए मैंने इंग्लिश की बजाए उनके बंाग्ला भाषा में लिखे साहित्य को अनुवाद करने का निर्णय लिया था। वह बताते है कि मैं 272 शायरों का तर्जुमा कर चुका हूं और 400 के करीब पुस्तकों का अनुवाद कर चुका हूं।
विज्ञापन
गुरुदेव की शायरी को छूना आसान काम नहीं
गुलजार ने रवींद्रनाथ टैगोर की पुस्तकों के अनुवाद के बारे में बताया कि उनकी शायरी को छूना आसान काम नहीं है, लेकिन मैं एक भाषा से दूसरी भाषा में जाना चाहता था। ज्यादातर लेखकों ने टैगोर के इंग्लिश लिटरेचर का अनुवाद किया है, इसलिए मैंने इंग्लिश की बजाए उनके बंाग्ला भाषा में लिखे साहित्य को अनुवाद करने का निर्णय लिया था। वह बताते है कि मैं 272 शायरों का तर्जुमा कर चुका हूं और 400 के करीब पुस्तकों का अनुवाद कर चुका हूं।
विज्ञापन
नसीर ऐसे बने गालिब
चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में गीतकार गुलजार
- फोटो : अमर उजाला
गुलजार ने बताया कि वह जब गालिब सीरियल बना रहे थे तो निर्माता नसीरुद्द्ीन शाह को गालिब की भूमिका में नहीं चाहते थे। उस पर नसीर भी इस भूमिका के लिए इतनी फीस मांग रहे थे, जो उस समय किसी टीवी कलाकार को नहीं मिलती थी। नसीर को कम फीस पर मनाने की कोशिश की गई तो वह गुलजार से मिलने आ पहुंचे।
नसीर ने कहा गुलजार साहब जब में सेंट स्टीफन में पढ़ता था, तब मैंने आपको खत लिखा था कि आप अभी गालिब न बनाएं। मैं बड़ा होकर इसमें काम करूंगा। उसके बाद जब आपने संजीव कुमार को लेकर गालिब बनाने की कोशिश की तब भी मैंने आपको खत लिखा कि संजीव मोटे हैं और इस रोल के लिए फिट नहीं हैं।
मैं आपसे साफ कह दूं कि मैं अपने अलावा किसी ओर को गालिब बनने नहीं दूंगा और फीस भी कम नहीं करूंगा। तब गुलजार ने निर्माता को मनाया कि वह उन्हें पहले कोई मेहनताना न दें और नसीर को पूरी फीस दे दें। जब यह बना तो निर्माता इतने खुश हुए कि उन्होंने इसके अधिकार ही मुझे दे दिए। तीन लोगों की वजह से यह बन पाया। एक नसीर, दूसरे जगजीत सिंह और तीसर खुद गालिब।
नसीर ने कहा गुलजार साहब जब में सेंट स्टीफन में पढ़ता था, तब मैंने आपको खत लिखा था कि आप अभी गालिब न बनाएं। मैं बड़ा होकर इसमें काम करूंगा। उसके बाद जब आपने संजीव कुमार को लेकर गालिब बनाने की कोशिश की तब भी मैंने आपको खत लिखा कि संजीव मोटे हैं और इस रोल के लिए फिट नहीं हैं।
मैं आपसे साफ कह दूं कि मैं अपने अलावा किसी ओर को गालिब बनने नहीं दूंगा और फीस भी कम नहीं करूंगा। तब गुलजार ने निर्माता को मनाया कि वह उन्हें पहले कोई मेहनताना न दें और नसीर को पूरी फीस दे दें। जब यह बना तो निर्माता इतने खुश हुए कि उन्होंने इसके अधिकार ही मुझे दे दिए। तीन लोगों की वजह से यह बन पाया। एक नसीर, दूसरे जगजीत सिंह और तीसर खुद गालिब।
बाल साहित्य का लेखन बहुत कम
चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में गीतकार गुलजार
- फोटो : अमर उजाला
गुलजार ने बताया कि यह दुख की बात है कि आज बाल साहित्य बहुत कम है। बड़ों पर तो सब लिख लेते हैं लेकिन बच्चों पर लिखने के लिए एक लेखक को पहले बच्चों की भाषा सीखनी पड़ती है फिर ही वह उसमें कामयाब हो पाता है।
इसीलिए बच्चों के लिए लिखना ज्यादा मुश्किल है। यह बड़े अफसोस की बात है कि बांग्ला, मराठी और मलयालम को छोड़कर अन्य किसी भाषा में बाल साहित्य नहीं लिखा जा रहा। लेकिन टैगोर की बात की जाए तो बाल साहित्य में भी उनका काफी योगदान रहा है।
...तो क्या लिखना बंद कर दें
गुलजार ने कहा कि लिखना ज्यादा जरूरी है। किताबें बिक रही हैं या नहीं? यह ज्यादा महत्व नहीं रखता। सबसे बड़ी बात लिखना है।
इसीलिए बच्चों के लिए लिखना ज्यादा मुश्किल है। यह बड़े अफसोस की बात है कि बांग्ला, मराठी और मलयालम को छोड़कर अन्य किसी भाषा में बाल साहित्य नहीं लिखा जा रहा। लेकिन टैगोर की बात की जाए तो बाल साहित्य में भी उनका काफी योगदान रहा है।
...तो क्या लिखना बंद कर दें
गुलजार ने कहा कि लिखना ज्यादा जरूरी है। किताबें बिक रही हैं या नहीं? यह ज्यादा महत्व नहीं रखता। सबसे बड़ी बात लिखना है।