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पंजाब कला भवन में बिखरा पंजाबी लोक गीतों का रंग, दर्शक झूमने पर मजबूर
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 25 Oct 2016 09:34 PM IST
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पंजाब कला भवन में बिखरा पंजाबी लोक गीतों का रंग
- फोटो : अमर उजाला
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इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस और पंजाब कला परिषद् की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मानसा के कलहेरी आर्ट और संस्कृति अकादमी के 55 कलाकारों ने पंजाब के लोक गीत और नृत्य की प्रस्तुति दी।
कार्यक्रम की शुरुआत सिमरनप्रीत कौर ने लोक गीत जैमल फत्ता से की। उसके बाद लोक नृत्य झूमरपेश किया गया। बठिंडा के माता सुंदरी गर्ल्ज कॉलेज ढ़ड्डे की 15 लड़कियों ने बोलियां गाकर गिद्दा पेश किया। इसके बाद पंजाबी गायिका अनमोल गगन मान ने जुगनी और मिर्जा पेश कर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद लुड्डी और मलवई गिद्दा की परफॉर्मेंस हुई।
कलहेरी आर्ट और संस्कृति अकादमी के लीडर तरसेम चंद पिछले 40 सालों से मुफ्त में लोक गीत और नृत्य प्रेमियों को यह कला सिखा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहली बार 1970 में एक प्रोजेक्टर पर मूवी में भंगड़ा देखा था। उसे देखकर मैं इतना खुश हुआ और ठान लिया कि यह विधा जरूर सीखूंगा। पर दो साल तक मुझे कोई सीखाने वाला नहीं मिला। मुझे लोग कहते कि एह ता मरासियां दा कम्म ऐ, पर मैंने उन्हें कहा कि जो भी हो लेकिन मैं इसे जरूर सीखूंगा। एक दिन मैंने सुनाम के भाना राम सुनैरी के बारे में सुना और उनसे भंगड़ा सीखना शुरू कर दिया और आज जो भी हूं उनकी बदौलत हूं।
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कार्यक्रम की शुरुआत सिमरनप्रीत कौर ने लोक गीत जैमल फत्ता से की। उसके बाद लोक नृत्य झूमरपेश किया गया। बठिंडा के माता सुंदरी गर्ल्ज कॉलेज ढ़ड्डे की 15 लड़कियों ने बोलियां गाकर गिद्दा पेश किया। इसके बाद पंजाबी गायिका अनमोल गगन मान ने जुगनी और मिर्जा पेश कर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद लुड्डी और मलवई गिद्दा की परफॉर्मेंस हुई।
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कलहेरी आर्ट और संस्कृति अकादमी के लीडर तरसेम चंद पिछले 40 सालों से मुफ्त में लोक गीत और नृत्य प्रेमियों को यह कला सिखा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहली बार 1970 में एक प्रोजेक्टर पर मूवी में भंगड़ा देखा था। उसे देखकर मैं इतना खुश हुआ और ठान लिया कि यह विधा जरूर सीखूंगा। पर दो साल तक मुझे कोई सीखाने वाला नहीं मिला। मुझे लोग कहते कि एह ता मरासियां दा कम्म ऐ, पर मैंने उन्हें कहा कि जो भी हो लेकिन मैं इसे जरूर सीखूंगा। एक दिन मैंने सुनाम के भाना राम सुनैरी के बारे में सुना और उनसे भंगड़ा सीखना शुरू कर दिया और आज जो भी हूं उनकी बदौलत हूं।
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