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सफर करते समय बस की खिड़की से हाथ बाहर होना लापरवाही नहीं: हाईकोर्ट
विवेक शर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 12 Jun 2018 10:33 AM IST
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कोर्ट
- फोटो : amar ujala
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सफर करते हुए अगर कोई व्यक्ति अपना हाथ खिड़की के बार रखता है तो उसे लापरवाह नहीं कहा जा सकता। भारत में अक्सर लोग आराम के लिए अपना हाथ खिलाड़ी पर रखकर चलते हैं। खिड़की पर हाथ रखकर चलने के कारण अपना हाथ गंवाने वाले की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए यह व्यवस्था दी। मामला विकास सहगल की याचिका से जुड़ा है जो बस में सफर कर रहा था और खिड़की खोलने के लिए हाथ बाहर होने के चलते सामने से आ रहे एक ट्रक ने बिलकुल नजदीक से गुजरते हुए उसकी बाजू कुचल दी थी।
सन 2000 में हुई इस दुर्घटना के लिए बस ड्राइवर को दोषी करार देते हुए याची ने 10 लाख रुपये मुआवजा दिए जाने की मांग की थी। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल जालंधर ने बस चालक, ट्रक चालक और पीड़ित तीनों को दोषी करार दिया था और 1 लाख 20 हजार रुपये मुआवजा तय किया था। विकास को लापरवाह बताते हुए ट्रिब्यूनल ने 50 प्रतिशत राशि की कटौती कर मुआवजा राशि 60 हजार कर दी थी। हाईकोर्ट में विकास ने अपील दाखिल की थी, जिसका पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने विकास के पक्ष में निपटारा कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि लोग अक्सर आराम के लिए अपने वाहन या बस की खिड़की पर हांथ रखते हुए सफर करते हैं और उनका हांथ बाहर की ओर होता है। इस स्थिति में उन्हें लापरवाह नहीं कहा जा सकता। यह ड्राइवर की जिम्मेदारी होती है कि वह सुरक्षित दूरी बनाए रखे और क्लोज ड्राइविंग न करे। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट में कहीं पर भी बाजू निकालने पर पाबंदी नहीं है और न ही भारतीय सड़कों के बारे में चर्चा जहां पशु आम तौर पर सड़कों पर घूमते मिल जाते हैं और अक्सर चालकों को हादसा टालने के लिए ब्रेक लगाने पड़ जाते हैं।
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कोर्ट ने कहा कि भले ही खिड़की से बाजू निकालना लापरवाही नहीं है लेकिन भारतीय सड़कों और यहां के ट्रैफिक को देखते हुए ड्राइवर और सवारियों दोनों को मुस्तैद रहने की जरूरत है। विकास की बाजू कुचलने के चलते हुए उसके नुकसान का मुआवजा बढ़ाते हुए कोर्ट ने कहा कि वह नक्शा सप्लाई करता था और ऐसे में निश्चित रूप से उसका काम प्रभावित होगा और उसे एक सहायक की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसल को रद्द करते हुए कहा कि विकास की लापरवाही की बात साबित नहीं होती है और ऐसे में उसके लिए निर्धारित मुआवजा राशि को 60 हजार से बढ़ाकर हाईकोर्ट ने 5 लाख 86 हजार कर दिया।
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सन 2000 में हुई इस दुर्घटना के लिए बस ड्राइवर को दोषी करार देते हुए याची ने 10 लाख रुपये मुआवजा दिए जाने की मांग की थी। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल जालंधर ने बस चालक, ट्रक चालक और पीड़ित तीनों को दोषी करार दिया था और 1 लाख 20 हजार रुपये मुआवजा तय किया था। विकास को लापरवाह बताते हुए ट्रिब्यूनल ने 50 प्रतिशत राशि की कटौती कर मुआवजा राशि 60 हजार कर दी थी। हाईकोर्ट में विकास ने अपील दाखिल की थी, जिसका पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने विकास के पक्ष में निपटारा कर दिया।
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कोर्ट ने कहा कि लोग अक्सर आराम के लिए अपने वाहन या बस की खिड़की पर हांथ रखते हुए सफर करते हैं और उनका हांथ बाहर की ओर होता है। इस स्थिति में उन्हें लापरवाह नहीं कहा जा सकता। यह ड्राइवर की जिम्मेदारी होती है कि वह सुरक्षित दूरी बनाए रखे और क्लोज ड्राइविंग न करे। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट में कहीं पर भी बाजू निकालने पर पाबंदी नहीं है और न ही भारतीय सड़कों के बारे में चर्चा जहां पशु आम तौर पर सड़कों पर घूमते मिल जाते हैं और अक्सर चालकों को हादसा टालने के लिए ब्रेक लगाने पड़ जाते हैं।
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कोर्ट ने कहा कि भले ही खिड़की से बाजू निकालना लापरवाही नहीं है लेकिन भारतीय सड़कों और यहां के ट्रैफिक को देखते हुए ड्राइवर और सवारियों दोनों को मुस्तैद रहने की जरूरत है। विकास की बाजू कुचलने के चलते हुए उसके नुकसान का मुआवजा बढ़ाते हुए कोर्ट ने कहा कि वह नक्शा सप्लाई करता था और ऐसे में निश्चित रूप से उसका काम प्रभावित होगा और उसे एक सहायक की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसल को रद्द करते हुए कहा कि विकास की लापरवाही की बात साबित नहीं होती है और ऐसे में उसके लिए निर्धारित मुआवजा राशि को 60 हजार से बढ़ाकर हाईकोर्ट ने 5 लाख 86 हजार कर दिया।