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पंजाब के लोगों का गुस्सा फूटा, 2014 के आगाज का 2017 में अंजाम

Sun, 12 Mar 2017 09:32 AM IST
निवेदिता ए वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
निवेदिता ए वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 12 Mar 2017 09:32 AM IST
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Punjab assembly elections 2017, captain amarinder singh wins
पंजाब विधानसभा चुनाव - फोटो : File Photo
बादल सरकार के खिलाफ पंजाब के लोगों में जिस गुस्से की शुरुआत 2014 के लोकसभा चुनाव में हुई थी, वह 2017 में अपने अंजाम पर पहुंच गई। जब पूरे देश में मोदी लहर थी तब पंजाब के लोगों ने कद्दावर भाजपाई अरुण जेटली के मुकाबले कैप्टन अमरिंदर सिंह को जीत दिलाकर बादल सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई थी।
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इसके अलावा बादलों के लिए दूसरा सैटबैक था मालवा में आम आदमी पार्टी की बंपर जीत। कारण कई थे, लेकिन लोगों की नाराजगी की ये एक बानगी थी जो 2017 में पूरी पिक्चर केतौर पर सामने आ गई। आम आदमी पार्टी को हालांकि वह जीत नहीं मिली जिसकी उम्मीद उन्हें थी, लेकिन पार्टी ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज जरूर करवा दी। वहीं कांग्रेस इस बार कैप्टन के करिश्माई व्यक्तित्व और एंटी इनकंबेसी लहर में जीत दर्ज कर पाई।
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बड़े बादल इस बार भी अपनी सीट बचाने में तो कामयाब रहे लेकिन 10 साल की सरकार को नहीं बचा पाए। आप और कांग्रेस के हालात एक से हैं। आप को अपने केंद्रीय नेतृत्व की वजह से वोट हासिल हुए वहीं कांग्रेस अपने स्थानीय नेतृत्व की लहर पर सवार होकर कुर्सी तक जा पहुंची।
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बेअदबी की आग में झुलस गए बादल

Punjab assembly elections 2017, captain amarinder singh wins
प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल - फोटो : अमर उजाला
बेअदबी की आग में झुलस गए बादल
अक्तूबर 2015 में फरीदकोट के बरगाड़ी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के बाद जिस आग में पंजाब जला, बादल उसी में झुलस गए। बेअदबी के आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए धरने पर बैठे लोगों पर फायरिंग और उसमें दो लोगों अवतार सिंह और गुरजीत सिंह की मौत के बाद पंथक वोटों का ध्रुवीकरण होना शुरू हुआ। हालांकि सरकार ने इसे रोकने के लिए सख्त कानून बनाया लेकिन बेअदबी की घटनाएं बढ़ती रहीं और लोगों में नाराजगी भी। इसका असर ये दिखा कि 2017 चुनाव में टकसाली अकाली जत्थेदार तोता सिंह और गुलजार सिंह रणीके तक को हार का मुंह देखना पड़ा।

इसके अलावा अक्तूबर 2015 में ही सिखों की सर्वोच्च संस्था श्री अकाल तख्त साहिब की तरफ से डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां को गुरु साहिब के वेश में जाम-ए-इंसां पिलाने के आरोप में माफी दे दी गई। डेरा प्रमुख को लिखित माफीनामे के आधार पर माफी दी गई थी। इससे सिख संगठन भड़क गए। इसकेबाद इस फैसले को वापस ले लिया गया था। इस मामले के बाद गरमपंथियों की तरफ से सरबत खालसा का आयोजन किया गया। इसमें पांचों तख्तों के अलग जत्थेदार नियुक्त कर दिए गए। अकाल तख्त साहिब के पंज प्यारों ने बेअदबी मामले में सरकार का विरोध जताया तो उन्हें सेवा से हटा दिया गया। इसके अलावा दरबार साहिब के एक अरदासिए ने मुख्यमंत्री बादल को सिरोपा देने से इंकार कर दिया था। इसके बाद उन्हें भी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था हालांकि बाद में उन्हें बहाल कर दिया गया था।
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