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दिल को छू गया नाटक बूढ़ी काकी
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चंडीगढ़। चंडीगढ़ में आयोजित टीएफटी विंटर नेशनल थियेटर फेस्टिवल के दौरान मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित नाटक बूढ़ी काकी का मंचन किया गया। इसका निर्देशन अतुल यदुवंशी ने किया। इसका नाट्य रूपांतरण राजकुमार श्रीवास्तव में किया। इसे स्वर्ग रंगमंडल की टीम ने पेश किया।
सामाजिक सरोकारों और यथार्थवादी लेखन के सिरमौर मुंशी प्रेमचंद के नाटक बूढ़ी काकी की कहानी एक बूढ़ी औरत के इर्दगिर्द घूमती है। यह जीवन के अंतिम पड़ाव के वक्त भी छोटी-छोटी चीजों के प्रति रुझान रखती है और उनको पाना चाहती है। बूढ़ी काकी में स्वाद के अतिरिक्त और कोई भी ख्वाहिश नहीं बची थी।
नाटक में दिखाया जाता है कि वह अब अपने कष्टों को लेकर हमेशा रोती रहती थी। उसके पतिदेव को स्वर्ग सिधारे काफी समय हो चुका होता है। बेटे जवान होकर चल बसे थे। अब बूढ़ी काकी का भतीजे बुद्धिराम के सिवाय और कोई न था। उसके भतीजे के बड़े लड़के का तिलक आता है तो घी और मसाले की सुगंध चारों ओर फैल जाती है। बूढ़ी काकी इस स्वाद से बेचैन होकर खाना खाने पहुंच जाती है। कई मेहमान चौक कर खड़े हो जाते हैं कि आखिरकार मैले-कुचैले कपड़े पहनकर कौन-सी बूढ़ी औरत आ गई। इस पर पंडित बुद्धिराम काकी को देखते ही क्रोध से तिलमिला उठते हैं और उसे अंधेरी कोठरी में ले जाकर बंद कर देते हैं। बुद्धिराम की पत्नी भी गुस्सा होती है। देर रात जब बूढ़ी काकी को भूख लगती है तो वह जूठे पत्तलों के पास बैठकर जूठन खाने लगती है। अचानक यह सब देखकर बुद्धिराम की पत्नी को ग्लानि होती है और वह काकी से माफी मांग कर खाना खाने को बोलती है।
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नाटक में अभिनय करने वाले कलाकार
नाटक में धीरज अग्रवाल, श्रद्धा देशपांडे, सोनम सेठ, नीरज अग्रवाल, प्रिया मिश्रा, संदीप शुक्ला, आर्यन मोहिले, अद्वितीय, अनन्या मोहिले, कृष्णा मौर्या, धुरंधर सचिन केसरवानी, वैष्णवी केसरी, सुमन कश्यप, मोहम्मद हमीद, देवेंद्र राजभर, शिव कुमार सरस्वती, देवेंद्र कुमार सिंह, एजाज, रोशन पांडे, कमलेश चंद्र यादव, गुलाब मौर्या, कृष्णा मौर्या ने अभिनय किया।
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सामाजिक सरोकारों और यथार्थवादी लेखन के सिरमौर मुंशी प्रेमचंद के नाटक बूढ़ी काकी की कहानी एक बूढ़ी औरत के इर्दगिर्द घूमती है। यह जीवन के अंतिम पड़ाव के वक्त भी छोटी-छोटी चीजों के प्रति रुझान रखती है और उनको पाना चाहती है। बूढ़ी काकी में स्वाद के अतिरिक्त और कोई भी ख्वाहिश नहीं बची थी।
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नाटक में दिखाया जाता है कि वह अब अपने कष्टों को लेकर हमेशा रोती रहती थी। उसके पतिदेव को स्वर्ग सिधारे काफी समय हो चुका होता है। बेटे जवान होकर चल बसे थे। अब बूढ़ी काकी का भतीजे बुद्धिराम के सिवाय और कोई न था। उसके भतीजे के बड़े लड़के का तिलक आता है तो घी और मसाले की सुगंध चारों ओर फैल जाती है। बूढ़ी काकी इस स्वाद से बेचैन होकर खाना खाने पहुंच जाती है। कई मेहमान चौक कर खड़े हो जाते हैं कि आखिरकार मैले-कुचैले कपड़े पहनकर कौन-सी बूढ़ी औरत आ गई। इस पर पंडित बुद्धिराम काकी को देखते ही क्रोध से तिलमिला उठते हैं और उसे अंधेरी कोठरी में ले जाकर बंद कर देते हैं। बुद्धिराम की पत्नी भी गुस्सा होती है। देर रात जब बूढ़ी काकी को भूख लगती है तो वह जूठे पत्तलों के पास बैठकर जूठन खाने लगती है। अचानक यह सब देखकर बुद्धिराम की पत्नी को ग्लानि होती है और वह काकी से माफी मांग कर खाना खाने को बोलती है।
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नाटक में अभिनय करने वाले कलाकार
नाटक में धीरज अग्रवाल, श्रद्धा देशपांडे, सोनम सेठ, नीरज अग्रवाल, प्रिया मिश्रा, संदीप शुक्ला, आर्यन मोहिले, अद्वितीय, अनन्या मोहिले, कृष्णा मौर्या, धुरंधर सचिन केसरवानी, वैष्णवी केसरी, सुमन कश्यप, मोहम्मद हमीद, देवेंद्र राजभर, शिव कुमार सरस्वती, देवेंद्र कुमार सिंह, एजाज, रोशन पांडे, कमलेश चंद्र यादव, गुलाब मौर्या, कृष्णा मौर्या ने अभिनय किया।