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भाई-बहन का कमाल... टीबी डायग्नोस्टिक की नई तकनीक बनाई, पीजीआई चंडीगढ़ ने कराया पेटेंट
Tue, 14 Jul 2020 11:58 AM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Tue, 14 Jul 2020 11:58 AM IST
सार
- जल्द डायग्नोस होने से पता चल जाएंगे बीमारी के लक्षण
- 2007-08 में शुरू किया था नई तकनीक पर काम करना
- एक लैम्प तकनीक का भी भाई-बहन ने किया है निर्माण
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Social media
विस्तार
चंडीगढ़ पीजीआई की प्रो. कुसुम शर्मा और उनके भाई प्रो. अमन शर्मा ने टीबी का पता लगाने के लिए नई तकनीक विकसित करके उसे पेटेंट कराया है। पीजीआई के पूर्व डीन सुभाष वर्मा ने इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया था।
पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी डिपार्टमेंट की प्रो. कुसुम ने बताया कि टीबी का सही समय पर पता न चले और समय पर इलाज न मिले तो यह जानलेवा हो सकती है। उन्होंने कहा कि टीबी सिर्फ फेफड़ों में ही नहीं होती बल्कि जोड़ों, आंखों और ब्रेन की टीबी भी होती है। कई बार टीबी में बैक्टीरिया की संख्या कम होती है इसलिए पुरानी तकनीक से बीमारी का पता चलने में थोड़ी देरी लगती थी।
इंटरनल मेडिसिन के डॉ. अमन शर्मा ने बताया कि इस तकनीक में नई किस्म की पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (पीसीआर) को पेटेंट कराया है। यह पेंटेंट इंडियन पेटेंट ऑफिस नई दिल्ली ने जारी किया है। इससे उपरोक्त ऑर्गन में होने वाली टीबी को डायग्नोस करने में सुविधा होगी। इस तकनीक को यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा ने मान्यता दी है।
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इन एक्स पल्मोनरी टीबी की गंभीरता को देखते हुए सेंट्रल टीबी डिवीजन नई दिल्ली इंडेक्स ने टीबी गाइडलाइंस जारी की थी। इसमें प्रो. कुसुम को लीड माइक्रो बायोलॉजिस्ट चुना गया था। यह गाइडलाइन एम्स नई दिल्ली, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के सहयोग से बनाई गई थी।
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पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी डिपार्टमेंट की प्रो. कुसुम ने बताया कि टीबी का सही समय पर पता न चले और समय पर इलाज न मिले तो यह जानलेवा हो सकती है। उन्होंने कहा कि टीबी सिर्फ फेफड़ों में ही नहीं होती बल्कि जोड़ों, आंखों और ब्रेन की टीबी भी होती है। कई बार टीबी में बैक्टीरिया की संख्या कम होती है इसलिए पुरानी तकनीक से बीमारी का पता चलने में थोड़ी देरी लगती थी।
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इंटरनल मेडिसिन के डॉ. अमन शर्मा ने बताया कि इस तकनीक में नई किस्म की पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (पीसीआर) को पेटेंट कराया है। यह पेंटेंट इंडियन पेटेंट ऑफिस नई दिल्ली ने जारी किया है। इससे उपरोक्त ऑर्गन में होने वाली टीबी को डायग्नोस करने में सुविधा होगी। इस तकनीक को यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा ने मान्यता दी है।
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इन एक्स पल्मोनरी टीबी की गंभीरता को देखते हुए सेंट्रल टीबी डिवीजन नई दिल्ली इंडेक्स ने टीबी गाइडलाइंस जारी की थी। इसमें प्रो. कुसुम को लीड माइक्रो बायोलॉजिस्ट चुना गया था। यह गाइडलाइन एम्स नई दिल्ली, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के सहयोग से बनाई गई थी।
जल्द डायग्नोस होने से पता चल जाएंगे बीमारी के लक्षण
इस तकनीक से पहले पीसीआर में सिर्फ एक प्राइमर का इस्तेमाल करके टेस्ट किया जाता था, लेकिन इस टेस्ट में तीन प्राइमर का इस्तेमाल होने के कारण इसकी डायग्नोस्टिक क्षमता बढ़ी है। जल्दी डायग्नोस होने से मरीजों में शुरुआती लक्षण का आसानी से पता चल जाएगा। इससे मरीज समय रहते इलाज करा सकेंगे। पीजीआई के डायरेक्टर प्रो. जगत राम ने इस तकनीक की सराहना की है। उन्होंने कहा कि इस तकनीक के इस्तेमाल से टीबी के मरीज जल्द ठीक होंगे।
2007-08 में शुरू किया था नई तकनीक पर काम
डॉ. अमन ने बताया कि 2007-08 में नई तकनीक पर काम शुरू किया गया था। इस काम में डॉ. सुभाष वर्मा ने एक्सट्रा पल्मोनरी टीबी, प्रो. अमोद गुप्ता ने आंख की टीबी, प्रो. एमएस ढिल्लो ने जोड़ों की टीबी, प्रो. एसके सिन्हा ने पेट की टीबी, प्रो. सुदेश प्रभाकर और वर्तमान में प्रो. मनीष मोदी का ब्रेन की टीबी में विशेष योगदान रहा।
एक लैम्प तकनीक का भी किया है निर्माण
डॉ. कुसुम ने बताया कि इस तकनीक को विकसित करने के बाद अब आगे और ऐसे टेस्ट विकसित किए जा रहे हैं, जो कि सस्ते हों और मरीज को जल्द फायदा देने वाले हों। टीबी को डायग्नोस करने के लिए एक लैंप तकनीक को भी विकसित किया गया है। डॉ. कुसुम का टीबी के मॉलीक्यूलर डायग्नोसिस में उल्लेखनीय काम रहा है।
2007-08 में शुरू किया था नई तकनीक पर काम
डॉ. अमन ने बताया कि 2007-08 में नई तकनीक पर काम शुरू किया गया था। इस काम में डॉ. सुभाष वर्मा ने एक्सट्रा पल्मोनरी टीबी, प्रो. अमोद गुप्ता ने आंख की टीबी, प्रो. एमएस ढिल्लो ने जोड़ों की टीबी, प्रो. एसके सिन्हा ने पेट की टीबी, प्रो. सुदेश प्रभाकर और वर्तमान में प्रो. मनीष मोदी का ब्रेन की टीबी में विशेष योगदान रहा।
एक लैम्प तकनीक का भी किया है निर्माण
डॉ. कुसुम ने बताया कि इस तकनीक को विकसित करने के बाद अब आगे और ऐसे टेस्ट विकसित किए जा रहे हैं, जो कि सस्ते हों और मरीज को जल्द फायदा देने वाले हों। टीबी को डायग्नोस करने के लिए एक लैंप तकनीक को भी विकसित किया गया है। डॉ. कुसुम का टीबी के मॉलीक्यूलर डायग्नोसिस में उल्लेखनीय काम रहा है।