प्राकृतिक खेती: लागत कम और मुनाफा भरपूर, मनुष्य संग धरती भी सेहतमंद, देश-विदेश में बढ़ा रुझान
एचएयू के अधीन वरिष्ठ वैज्ञानिक रहे एवं गुरुकुल कुरुक्षेत्र के प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण संस्थान के राज्य ट्रेनिंग एडवाइजर डॉ. हरिओम का कहना है कि अगर प्राकृतिक खेती के इनपुट्स को सही क्रियाओं और समन्वय के साथ प्रयोग किया जाता है तो आरंभ से ही फसल की पूरी पैदावार मिलने लगती है। खास बात है कि यह दुनिया के किसी भी कोने में और हर परिस्थिति में संभव है।
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प्राकृतिक खेती, जिसे शून्य लागत खेती और सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के नाम से भी जाना जाता है। इसे अपनाकर किसान न केवल रसायनयुक्त फसल पर आने वाले खर्च को रोक सकता है, बल्कि अच्छा मुनाफा भी कमा सकता है। साथ ही स्वयं के साथ अन्य को भी बेहतर सेहत प्रदान कर सकता है। यही कारण है कि जागरूकता के साथ ही प्राकृतिक खेती की ओर किसानों का रुझान बढ़ने लगा है।
दरअसल, हरियाणा ही नहीं पूरे देश में अब प्राकृतिक खेती के प्रति किसान उत्साहित हैं और प्रदेश से लेकर केंद्र सरकार भी इसे बढ़ावा देने में लगी है। संभावना जताई जा रही है कि आने वाले कुछ वर्षों में किसान पूरी तरह से प्राकृतिक खेती करने लगेंगे। इस संदर्भ में प्राकृतिक खेती का गुरुकुल कुरुक्षेत्र में अपनाया गया मॉडल सफल माना जा रहा है, जिसे देखकर हमारे देश के साथ-साथ नेपाल, श्रीलंका सहित अन्य कई देशों के बड़े कृषि विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता भी स्वीकार कर चुके हैं कि आने वाले समय में इसे बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है। तभी मनुष्य के साथ-साथ धरती की सेहत भी तंदुरुस्त रखी जा सकती है। इसके अलावा प्राकृतिक खेती से गाय के प्रति भी सम्मान बढ़ेगा।
अभी तक गुरुकुल कुरुक्षेत्र के प्राकृतिक खेती मॉडल का पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, केंद्रीय कृषि मंत्री सहित अन्य मंत्री कई राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपालों के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, गुजरात सहित अनेकों राज्यों के 425 कृषि विज्ञान केंद्रों के 500 से ज्यादा वैज्ञानिक व हजारों किसान अवलोकन कर चुके हैं।
किसान को दवा, खाद के लिए नहीं जाना पड़ेगा बाजार
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में लगे विशेषज्ञों की मानें तो यह एक ऐसी पद्धति है, जिसमें एक देसी गाय से 30 एकड़ (12 हेक्टर) तक की खेती संभव हो सकती है। कृषि की इस पद्धति में फसल में किसी भी रासायनिक खाद, जैविक खाद या दवाइयों की आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि इस पद्धति के तहत खेत में जीवाणुओं का कल्चर डाला जाता है तथा फसल में प्रयोग होने वाला कोई भी इनपुट बाजार से नहीं खरीदना पड़ता है। इस पद्धति में देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से घर पर ही बहुत कम समय में ऐसे इनपुट तैयार किए जाते हैं जिनके प्रयोग से खेत में जीवाणु और केंचुओं की अप्रत्याशित वृद्धि होती है। यह जीवाणु वायुमंडल में विद्यमान 78 प्रतिशत नाइट्रोजन को पौधे की जड़ों और भूमि में स्थिर करते हैं तथा फसल के लिए दूसरे पोषक तत्वों की उपलब्धि भी बढ़ाते हैं।
सही विधि अपनाएं तो पहली फसल में ही भरपूर पैदावार: डॉ हरिओम
एचएयू के अधीन वरिष्ठ वैज्ञानिक रहे एवं गुरुकुल कुरुक्षेत्र के प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण संस्थान के राज्य ट्रेनिंग एडवाइजर डॉ. हरिओम का कहना है कि अगर प्राकृतिक खेती के इनपुट्स को सही क्रियाओं और समन्वय के साथ प्रयोग किया जाता है तो आरंभ से ही फसल की पूरी पैदावार मिलने लगती है। खास बात है कि यह दुनिया के किसी भी कोने में और हर परिस्थिति में संभव है, क्योंकि यह पद्धति जीवाणु और केंचुओं पर आधारित है और भूमि पर कोई भी ऐसा स्थान नहीं है जहां पर सूक्ष्म जीवाणु विद्यमान न हों। प्राकृतिक कृषि में पहले ही वर्ष से जैविक कार्बन में अप्रत्याशित वृद्धि होने लगती है, पानी की बचत होती है और भूमि, जल तथा वातावरण का प्रदूषण नहीं होता है।
फसल में बीमारी का प्रकोप बेहद कम
डॉ. हरिओम बताते हैं कि प्राकृतिक खेती में कीट व बीमारियों का प्रकोप बहुत कम होता है। इनके नियंत्रण के लिए घर पर ही जो प्राकृतिक बायोफॉर्मूलेशन तैयार किए जाते हैं, वह हर प्रकार के कीट और बीमारियों को कंट्रोल करने में प्रभावी होते हैं। इससे फसल की बढ़वार और पैदावार में लाभ मिलता है। प्राकृतिक कृषि में रासायनिक और जैविक कृषि की तरह ग्लोबल वार्मिंग पैदा करने वाली गैसों का उत्सर्जन होने की संभावना बहुत ही कम है, बल्कि इस पद्धति में हर परिस्थिति में कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन को बढ़ावा मिलता है।