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'पाकिस्तानी हूं पर भारत में दफन होना चाहता हूं'

Sun, 05 Apr 2015 07:51 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, उकलाना मंडी
ब्यूरो/अमर उजाला, उकलाना मंडी Updated Sun, 05 Apr 2015 07:51 AM IST
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pakistani resident life last wish

लाहौर निवासी राव शमशुदीन ने हमवतन लौटते समय जब आखिरी इच्छा बयां की तो मौके पर मौजूद लोगों की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि 'पाकिस्तानी हूं पर भारत में दफन होना चाहता हूं'।

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विगत पांच मार्च को पाकिस्तान का लाहौर निवासी राव शमशुदीन ने जब अटारी बार्डर पर पांव रखा था तो उसे आभास नहीं था कि उसे अपनी मातृभूमि भारत में इतना स्नेह और सम्मान मिलेगा की वह हमवतन लौटना ही भूल जाएगा।
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पाक लोगों ने उसे सलाह देते हुए कहा था कि वह तीन दिन में वापस आ जाएं। जब पांच मार्च को शमशुदीन ने अटारी बार्डर से भारत की सीमा पार पांव रखा वहीं से उसका जो स्वागत शुरू हुआ तो फिर यह सिलसिला चल ही निकला। शनिवार सुबह 4 बजे जब शमशुदीन उक लाना से हमवतन के लिए रवाना हुआ तब भी स्वागत व विदाई का सिलसिला जारी था।
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सुबह उसकी जन्म भूमि गांव प्रभुवाला के युवाओं ने पाक नागरिक को गांव की मिट्टी भेंट की। इसी के साथ उनको अन्य ढेर सारे उपहार भी दिए गए। गांव की मिट्टी स्वीकार करते हुए शमशुदीन ने कहा कि यह मेरे लिए इससे बड़ा कोई तोहफा नहीं है। मैं मृत्यु उपरांत अपनी जन्मस्थली की भूमि पर दफन होना चाहता था। पर यह संभव नहीं है।

मगर पाकिस्तान में जब भी मेरी मृत्यु के उपरांत मुझे दफनाया जाएगा तो यह मेरी मातृभूमि की मिट्टी भी मेरी क ब्र में मेरे साथ होगी। पाक नागरिक ने यह कहा कि इस मिट्टी का कुछ हिस्सा मैं अपने खेतों में भी बिखेरूंगा ताकि मेरे खेत की भूमि और फसल से मेरी जन्मस्थली की महक आती रहे।

भारत के नेता कई मायनों में पाक नेताओं से बेहतर

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शमशुदीन ने भारत और पाकिस्तान की राजनीति पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत के नेता कई मायनों में पाक नेताओं से बेहतर है। पाकिस्तान के राजनेताओं को अगर जुकाम भी हो जाता है तो वें उपचार के लिए अमेरिका भाग जाते है। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने अपने घुटनों का ऑपरेशन एवं मनमोहन सिंह ने बाईपास सर्जरी भारत में कराया।

शमशुदीन ने भारत की न्यायिक व्यवस्था की भी जमकर तारीफ की। यहां की अदालतें प्रधानमंत्री तक रहे नेता को भी तलब करने का अधिकार रखती है। भारत में पाकिस्तान की अपेक्षा शिक्षा और स्त्री उत्थान का ढांचा काफी बेहतर है। स्त्री को आज भी पाकिस्तान में दोयम दर्जे का माना जा रहा है। भारत में आम आदमी  को चुनाव लड़ने की हिम्मत रखता है।

अपनी जन्मस्थली 67 वर्ष बाद देखकर, यहां की गलियां, तालाब, वृक्ष और बुजुर्ग देखकर मेरे आंखों से आंसू बहने लगे थे। गांव में एक भी घर ऐसा नहीं था, जहां से मुझे खाने का निमंत्रण न मिला। हिसार के दयानंद कॉलेज में मुझे वक्ता के तौर बुलाया गया, गांव मौहब्बतपुर में मुझे समारोह में मुख्यतिथि बनाया गया। गांव मंगाली में मुझे बेटी बचाओं अभियान में शामिल किया गया।

पिछले वर्ष प्रभुवाला सर्च किया तो उनके सामने रामचंद्र सेलवाल, कुलदीप बिश्नोई, संदीप महता और राजेश जांगड़ा के नाम आए। इनसे मित्रता हुई , बातों का आदान-प्रदान हुआ तो मेरी जन्मस्थली देखने की इच्छा व्यक्त करने के बाद इन लोगों ने मेरी सरपंच रोहताश, जगन्नाथ से बात करवाई। कुमारी सैलजा से बात हुई। गांव के एक मात्र मुस्लिम परिवार लीला लुहार ने मुझे निमंत्रण दिया।

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