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शख्सियत सुरजीत पातर: कोलंबिया में दाढ़ी-पगड़ी देख बच्चे मुझे जादूगर समझने लगे, बोले- साइकिल को घोड़ा बना दो
Sun, 01 Jan 2023 11:30 PM IST
भूपेंद्र सिंह
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
Published by: भूपेंद्र सिंह
Updated Sun, 01 Jan 2023 11:30 PM IST
सार
पद्मश्री और साहित्यकार सुरजीत पातर ने जीवन के कई अनछुए पहलुओं को साझा किया। बोले कि मुझे कोलंबिया की याद जीवनभर रहेगी। कोलंबिया के लोगों ने दाढ़ी और पगड़ी का कवि नहीं देखा था।
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सुरजीत पातर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
मुझे कोलंबिया की याद जीवनभर रहेगी। कोलंबिया के लोगों ने दाढ़ी और पगड़ी का कवि नहीं देखा था। वहां मुझे मागो (जादूगर) कहते थे। इस पर मैंने कविता भी लिखी है। बच्चों ने कहा, ‘यदि तुम मागो हो तो मेरी साइकिल को घोड़ा बना दो। मैंने कहा कि मैं बच्चों का मागो नहीं, बड़ों का हूं तो बच्चे कहने लगे फिर मेरे माता-पिता के घर को महल बना दो।
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आखिर मैंने हारकर उन्हें अपनी असलियत बता दी। यह सुनकर बच्चों ने हंसते हुए कहा- अच्छा तो आप पोएट हो। वे साइकिल चलाते मुस्कुराते हुए पार्क से चले गए और मेरी कविता में शामिल हो गए।’ यह कहना है पद्यश्री और साहित्यकार सुरजीत पातर का।
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पूरे जीवन साहित्य को समर्पित रहे सुरजीत पातर का जन्म 14 जनवरी 1941 को जालंधर जिले के गांव पत्तड़ कलां में हुआ। साहित्यकार सुरजीत पातर ने बताया कि उन्होंने गांव के स्कूल में चौथी कक्षा तक की पढ़ाई की। इसके बाद दूसरे गांव खैरा माझा से हाईस्कूल तक की पढ़ाई की।
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रंधीर कॉलेज कपूरथला से स्नातक करने के बाद उन्होंने पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से पंजाबी में एमए किया। मन साहित्य के तरफ था तो गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर से गुरु नानक वाणी में लोकधारा का रूपांतरण विषय में पीएचडी की। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना में पंजाबी के प्रोफेसर भी रहे।
प्रकृति से अथाह प्रेम करने वाले सुरजीत पातर ने अपने मन में उद्रित होने वाले शब्दों को कविताओं के रूप में उकेरा कि वह कागजों पर जीवंत हो गए। यही कारण है कि वर्ष 1993 में सुरजीत पातर को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 2012 में साहित्य और शिक्षा में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
काव्यपाठ के लिए आप कैसे प्रेरित हुए?
बचपन में दो आकांक्षाएं थीं। पहला संगीतकार बनने की और दूसरा कवि बनने की। इनमें से कवि बनने वाली राह पकड़ ली। कॉलेज के दूसरे साल में ही कविता के प्रति काफी लगाव हुआ। कविताएं कहीं प्रकाशित हों इसलिए कई जगह भेजता था। पहले तीन बार कविताएं वापस गईं। उसके बाद तो पूरा पन्ना ही मेरी कविताओं से भर गया था। पहली बार वर्ष 1964 में प्रीतलड़ी पत्रिका में पहली बार मेरी कविता छपी। प्रीतलड़ी ने पत्तड़ का नाम पातर किया।
अब तक आपका साहित्य के क्षेत्र में कैसा सफर रहा है?
पहले काव्य संग्रह ‘कोलाज’ किताब में मेरी 10 कविताएं छपी थीं। पहला गजल संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हरफ प्रकाशित हुआ। अब तक सात किताबें कविता और एक गद्य की प्रकाशित हुई है। आठ विश्व प्रसिद्ध काव्य नाटकों का पंजाबी में रूपांतरण किया है। दूरदर्शन पर ‘सूरज दा सनमाना’ के तहत कवियों, जिसमें ऋग्वेद से लेकर शिव कुमार बटालवी तक 30 एपिसोड किया। यह पोएट्री के इतिहास पर काव्य धारावाहिक था। इसकी खोज, आलेख और पेशकारी भी की।
कौन सी घटनाओं ने आपको जीवन में प्रभावित किया?
एक मेरे पिता का परदेश जाना। जब में दूसरी जमात में पढ़ता था। उनसे मेरा काफी लगाव था। बहुत दिन के बाद इस पर मैंने गीत भी लिखे। दूसरी जमात का दर्द ने मुझे काफी प्रभावित किया। इसे मैंने एमए में बयां किया। ‘सुने सुने राहां विच कोई कोई पैड़ ऐ दिल ही उदास है बाकी सब खैर है।’
किस बात का आपको जीवन में मलाल रहा?
मैंने चौथी जमात में गुरु पर्व पर कविता लिखी थी। उस वक्त तो मेरे मन में भाव नहीं होते थे। कोशिशों का कुआं खोदता रहता था, बाद में इसमें पानी भी आया। बात कॉलेज की है। कॉलेज में मैग्जीन के लिए शिक्षक ने कविता मांगी थी। मेरे शिक्षक नाटककार थे। जब उन्होंने मेरी कविता देखी तो मुझसे कहा किसकी कविता चुराकर लाए हो। उस वक्त मेरे आंखों में आंसू आए लेकिन मैंने उन आंसुओं को छुपा लिया था। तीसरे दिन जब शिक्षक पढ़ाने आए तो सभी बच्चों को एक अफसोस की चिट्ठी लिखने को कहा। मैंने बहुत ही बेहतरीन चिट्ठी लिखी। उन्होंने जब मेरी चिट्ठी पढ़ी और फिर कहा कि वह कविता लेकर आओ।