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Interview: रॉक गार्डन ही नहीं, चंडीगढ़ की पहली सड़क भी नेकचंद ने ही बनवाई

Sun, 17 Dec 2017 05:48 PM IST
रिशु राज सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 17 Dec 2017 05:48 PM IST
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Nek chand son Anuj Saini Special interview
यह तस्वीर वर्ष 2000 की है, जब नेकचंद और उनके बेटे लाहौर यूनिवर्सिटी में आयोजित कांफ्रेस में हिस्सा लेने पाकिस्तान गए थे। - फोटो : अमर उजाला
रॉक गार्डन नेक चंद की रचनात्मकता और कल्पना का एक अद्भुत और उत्कृष्ट प्रतीक है। पद्मश्री से नवाजे गए नेकचंद, 15 दिसंबर को दुनिया में आए तो उनके मां-बाप ने सोच न होगा कि उनका बेटा पूरे देश के लिए एक मिसाल बनेगा। बेशक वे आज हमारे बीच नहीं, लेकिन हमारे दिलों में उनकी यादें हमेशा जिंदा हैं। नेकचंद के बेटे अनुज सैनी, जिन्होंने रॉक गार्डन के निर्माण को बहुत करीब से देखा है, उन्होने अमर उजाला से सांझा की नेकचंद की यादें...
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आपने रॉक गार्डन को बनते हुए देखा है, कोई किस्सा बताएं?
जवाब-पिता जी ने जब रॉक गार्डन को बनाना शुरू किया तो मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। थोड़ा बड़ा होने के बाद मैं यहां उनके साइकिल पर आता था। मेरे लिए तो उस समय यह सब खेल ही था, मैं यहां खेलता रहता था और वो काम में लगे रहते थे। यही नहीं आखिरी दिनों में वो जब कैंसर से जूझ रहे थे तो मैं उन्हें यहां व्हील चेयर पर लाया करता था। वो मुझसे अक्सर कहते रहते थे कि अभी यहां बहुत कुछ बनाना है। वह तरह-तरह के सुझाव देते थे, सच कहूं तो वह उन दिनों में भी रॉक गार्डन के बारे में सोचते रहते थे।
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यहां देखिए पूरा इंटरव्यू: जानिए उस शख्स के बारे में जिसके पत्थर भी बोलते थे
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गार्डन को बनाने के दौरान परिवार को कितना समय दे पाते थे नेकचंद?
जवाब- वह पूरी तरह से रॉक गार्डन के लिए समर्पित हो गए थे। वह कभी भी हमें बाहर घुमाने नहीं ले जा पाए। उनको न फिल्मों का शौक था न ही किसी जगह घूमने का। वह छुट्टी वाले दिन भी अपने काम में लगे रहते थे। सिर्फ दशहरे वाले दिन वो घर पर रहते थे, उस दिन भी हमें मां के साथ ही मेला घूमने जाना पड़ता था, वो नहीं जाते थे। रॉक गार्डन के लिए यह उनका त्याग ही था।

शहर के युवाओं को नेकचंद से क्या कुछ सीखना चाहिए?

Nek chand son Anuj Saini Special interview
पद्मश्री नेकचंद और उनके बेटे अनुज सैनी
शहर के युवाओं को नेकचंद से क्या कुछ सीखना चाहिए?
जवाब-युवाओं को पता होना चाहिए कि रॉक गार्डन असल में क्या है। रॉक गार्डन को सिर्फ बेकार समान जैसे टूटी हुई चूड़ी, चीनी मिट्टी के बर्तन आदि से बने मूर्तियों के लिए नहीं जाना जाए, बल्कि इसको बनाने में जो त्याग किया गया है, उसको जानना चाहिए। रॉक गार्डन के लिए उनका त्याग गजब का था। उस जमाने में यह पूरा जंगल हुआ करता था। अंधेरा होने के साथ जानवरों का भी काफी डर होता था इसके बावजूद वह रात में 12-1 बजे तक काम करते थे। रोशनी का तो नामो-निशान नहीं था, अंधेरे में काम करते समय समस्या होती तो वह खराब पड़े टायरों को जलाकर रोशनी करते थे। इस तरह की मेहनत, अगर कोई युवा कर सकता है तो जिंदगी में उसके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है।

नेकचंद को चंडीगढ़ में सबसे अच्छा क्या लगता था?
जवाब-उनको सारा शहर पसंद था। सच कहूं तो चंडीगढ़ उनके हाथों से ही बना है। शहर की पहली सड़क जो प्रेस बिल्डिंग से बस स्टैंड की तरफ जाती है, वो भी उन्होंने ही बनवाई है। रॉक गार्डन की जगह उस जमाने में यह पीडब्ल्यूडी का स्टोर हुआ करता था, उसके सामने वाली सड़क भी उन्होंने ही बनवाई थी। चंडीगढ़ उनके सपनों का शहर है, वो हर किसी के सामने तारीफ करते रहते थे।

चंडीगढ़ प्रशासन की तरफ से आपको कितना सहयोग मिल रहा है?
जवाब-प्रशासन की तरफ से पूरा सहयोग मिल रहा है। इसलिए ही उनके जन्मदिवस पर इतना बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। डॉल म्यूजियम भी प्रशासन के सहयोग से ही बना है। अगर उनका सपोर्ट न होता तो मुझे यहां घुसने भी नहीं दिया जाता।
 

ये नेकचंद का सफरनामा

Nek chand son Anuj Saini Special interview
नेकचंद की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं?
जवाब-हम उनकी विरासत को खराब नहीं होने देंगे। जो वो अधूरा एक्जिट पार्ट छोड़कर गए हैं वो हम अब पूरा करेंगे ताकि लोगों को बाहर आने के लिए वापिस न आना पड़े। उस पर काम तेजी से चल रहा है। इसके अलावा फेज-3 में 20 फीट चौड़ी और 7 फीट लंबी ऑल वैदर स्क्त्रस्ीन लगाई है। जिसपर रोजाना नेकचंद के जीवन पर आधारित 15 मिनट की डॉक्युमेंट्री दिखाई जाएगी। साथ ही पर्ची सिस्टम को खत्म कर मेट्रो स्टेशन जैसे ऑटोमेटिक गेट लगाए गए हैं, जो टोकन से खुलेंगे और बंद होंगे।

ये नेकचंद का सफरनामा
15 दिसंबर 1924- गुरदासपुर जिले के शकरगढ़ (पाकिस्तान) में जन्म
साल 1947-भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद चंडीगढ़ में आ बसे नेकचंद
साल 1951-शुरुआती पढ़ाई के बाद पीडब्ल्यूडी में रोड इंस्पेक्टर की नौकरी मिली।
साल 1958- गुपचुप तरीके से रॉक गार्डन को बनाने का काम शुरू किया।
साल 1976- काफी अड़चनों के बाद आधिकारिक तौर से रॉक गार्डन का उद्घाटन किया गया।
साल 1982- सम्मान के लिए सरकार ने एक पोस्टल टिकट जारी की।
साल 1984- देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक पद्मश्री से नवाजा गया।
12 जून 2015- कैंसर से पीड़ित 90 वर्षीय नेकचंद का पीजीआई में निधन।
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