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ये शख्स पहले कलपुर्जे बनाते थे, फिर शुरु किया पीसीबी

Sat, 23 Jan 2016 04:37 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पंचकूला
ब्यूरो/अमर उजाला, पंचकूला Updated Sat, 23 Jan 2016 04:37 PM IST
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msme haryana, light engineering industrialist success story

पंचकूला की पीसीबी यानी प्रिंटेड सर्किट बोर्ड इंडस्ट्री की धाक अब देशभर में है। पीसीबी यानी प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, जिसके बगैर कार हो या कोई इलेक्ट्रानिक्स आइटम सब बेकार है। पंचकूला में पीसीबी का कांसेप्ट लेकर आए रजनीश गर्ग। जिन्होंने एक छोटी की इलेक्ट्रानिक कलपुर्जों की इंडस्ट्री से अपने कैरियर की शुरुआत की और अब उनकी यह इंडस्ट्री शुमार हो चुकी है देश की टॉप 10 इंडस्ट्री में।

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पंचकूला फेज-2 स्थित इंडिया सर्किट्स लिमिटेड के डायरेक्टर रजनीश गर्ग ने कहा कि कि प्रिंटेड सर्किट बोर्ड  सबके लिए बेस हैं। एक नौकरीपेशा परिवार के सदस्य रजनीश गर्ग ने कहा कि उनको शिक्षा से लगाव रहा और इसी शिक्षा के कारण वह इस मंच पर आ गए। कुरुक्षेत्र में पढ़ाई करने के बाद रजनीश गर्ग ने आईआईटी नई दिल्ली से एमटेक किया और फिर रिसर्च  के बाद टेस्ट को देखते हुए शुरू की इलेक्ट्रानिक्स इंडस्ट्री।
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रजनीश गर्ग ने बताया कि वर्ष 1990  में पंचकूला में प्रिंटेड सर्किट बोर्ड की इंडस्ट्री लगाई। फिर वर्ष 2010 में बरवाला में इंटरनेशनल स्टैंडर्ड की फैक्ट्री लगाई। उन्होंने कहा कि प्रिंटेड सर्किट बोर्ड बनाने का काम शुरू किया तो उस समय देश में उत्पादन करीब दस हजार करोड़ रुपये का था, जो वर्ष 2020 में 27 सौ हजार करोड़ रुपये का होने की संभावना है।
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रजनीश गर्ग ने कहा कि जब काम शुरू किया उस समय भारत में इसका इंपोर्ट  किया जाता था। अब कोशिश है कि यह कलपुर्जा देश के बाहर से न आए। उन्होंने बताया कि प्रिंटेड सर्किट बेस कंपोनेंट है। इसमें सभी आईसी सर्किट  और कंपोनेंट लगते हैं।

रजनीश गर्ग ने बताया कि उनकी इंडस्ट्री मारुति, होंडा, हुंडई, फिलिप्स, ओसम, हैवेल्स एवरेडी, ल्युमिनिस, भारती टेलीकॉम और सैमसंग, एलजी जैसी कंपनियों  को सर्विस देती है। आईसीएल में सबसे ज्यादा प्रकार के पीसीबी बनते हैं। इनमें सिंगल साइडेड, डबल साइडेड, एमसीपीसीबी, गोल्ड प्लेटिंग और कार्बन के संग बनाए जाते हैं।

रजनीश गर्ग ने कहा कि यह सारा काम इतना आसान नहीं था। हर चीज चाहिए, बिजली, स्किल्ड लेबर और फाइनेंस जरूरी है। उन्होंने कहा कि वह दस से बारह घंटे रोजाना काम करते हैं। रजनीश गर्ग ने कहा कि उनको पढ़ाई के साथ हमेशा से लगाव रहा है।


इसी कारण अभी  भी वह अमेठी यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर प्रिंटेड सर्किट पर रिसर्च कर रहे हैं। इस रिसर्च के लिए भारत सरकार ने 65 लाख की ग्रांट दी है। रजनीश कुमार  गर्ग ने बताया कि इसके साथ ही कई रिसर्चý प्रोजेक्ट भी पाइप लाइन में हैं। 

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