राहत इंदौरी के निधन पर चंडीगढ़ में शोक, शहर के शायरों ने कुछ यूं किया याद
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गुलाब ख्वाब दवा जहर जाम क्या-क्या है, मैं आ गया हूं बता इंतजाम क्या-क्या है। राहत इंदौरी साहब की ये लाइनें अब शायद आपको उनकी आवाज में सुनाई न दें लेकिन उनके ये शब्द हमेशा अमर रहेंगे। प्रसिद्ध शायर राहत इंदौरी के निधन पर चंडीगढ़ में उनके प्रेमी बेहद दुखी हैं। उनके साथ बिताए लम्हों को याद कर वह उनको श्रद्धांजलि दे रहे हैं। अमर उजाला ने ऐसे कुछ लोगों से बातचीत की, जिन्होंने उनके जाने पर अपना दर्द बयां किया।
खालिस हिंदुस्तानी थे उनके शेर
मैं उनके साथ 22-23 साल शागिर्द के रूप में रहा। अच्छा शायर होने के लिए यह जरूरी है कि वह अच्छा इंसान भी हो, राहत इंदौरी साहब में यह दोनों गुण मौजूद थे। उनके शेर खालिस हिंदुस्तानी हैं। उनकी शायरी में आम बोलचाल की भाषा होती है, जिससे हर हिंदुस्तानी आसानी से समझ सकता है। उनकी शायरी का हर शब्द लोगों के दिलों तक पहुंचा है। उनके साथ बिताए पल अब बहुत याद आएंगे। अफसोस यह भी रहेगा कि अब उनकी जगह भरने के लिए देश में कोई शायर मौजूद नहीं है। - शम्स तबरेजी, शायर
उनकी मुहिम को समझ नहीं पाए लोग
राहत इंदौरी साहब के जाने का मुझे बेहद अफसोस है। उनके साथ कभी मुशायरा पढ़ने का मौका नहीं मिल पाया लेकिन सुनने का जरूर मिला। वह एक ऐसे शायर थे, जिनकी शायरी एक मुहिम से जुड़ी होती थी। हालांकि यह दुर्भाग्य रहा कि कुछ लोगों को उनकी मुहिम हिंदुस्तान के खिलाफ लगती थी, लेकिन वास्तविकता यह है कि वह अपनी मुहिम के जरिए समाज को जोड़ना चाहते थे। वह चाहते थे कि देश सभी का है मिलजुल कर रहो। वह प्रथम पंक्ति के शायर थे, उनकी जगह अब कोई नहीं ले सकता। - डॉ. सुशील हसरत नरेलवी, शायर
एक पूरी पीढ़ी उनसे प्रभावित थी
राहत इंदौरी साहब ऐसे शायर थे कि समाज की एक पीढ़ी उनसे प्रभावित थी। उन्होंने अपनी विद्वता के दम पर मुशायरे को साहित्यिक रंग दे दिया था। अधिकांश तौर पर शायर मुशायरे में श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए सतही शायरी करते नजर आते हैं लेकिन राहत साहब मुशायरों में अपना वही कलाम पेश करते थे, जो साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने को भेजते थे। मुझे उनके साथ वर्ष 2012 में लखनऊ में एक मुशायरा पढ़ने का मौका मिला था। उनके फक्कड़पन से कोई भी उनकी जहानत का अंदाजा नहीं लगा सकता। वे बहुत पढ़े-लिखे शायर थे। - महेंद्र सानी, शायर
उनकी शायरी के कायल थे हम
राहत साहब के जाने का बहुत दुख है। उनकी शायरी के चंडीगढ़ के लोग कायल थे, इस कारण से अभी तक कलामंच की ओर से तीन बार मुशायरा कराया गया, जिसमें उन्होंने भी हिस्सा लिया था। वह बेहद ही सरल और मजाकिया थे। चंडीगढ़ में जब भी वह मुशायरे के लिए आए, उनको हमेशा मैं ही एयरपोर्ट से लेने जाता था। इस दौरान वह कई अपनी कल्मों को पढ़ते थे, जिसमें वह यह बताते थे कि समाज सभी का है, इसमें किसी भी जाति या धर्म को लेकर भेदभाव नहीं होना चाहिए। - वसीम मीर, सदस्य, इबारत लेखक कलामंच
गंगा-जमुना तहजीब के शायर थे
राहत इंदौरी साहब गंगा-जमुना तहजीब के शायर थे। देश में भाईचारा बनाए रखने को लेकर कई नज्में पेश की। फिल्मी दुनिया में उनकी लेखनी का डंका बजता था, जो भी गाने उन्होंने लिखे उनको देश के लोगों ने खूब पसंद किया। कई बार उनके साथ मुझे मुशायरा पढ़ने का मौका मिला। वह बहुत ही तहजीब और प्यार से मिला करते थे, ऐसा लगता ही नहीं था कि वह इतने बड़े शायर होंगे। रूखसत जमाने से एक दिन सब हो जाएंगे, जानते हैं सब मगर, पता नहीं कब हो जाएंगे। - अल्लाह रखा, शायर