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लालच की इंतहा... मजदूरों के पास नहीं थे पैसे, मकान मालिक ने घर से मंगवाकर भरवाया तीन महीने का किराया

Sun, 24 May 2020 03:14 PM IST
ajay kumar संवाद न्यूज एजेंसी, जीरकपुर/डेराबस्सी ( पंजाब)
संवाद न्यूज एजेंसी, जीरकपुर/डेराबस्सी ( पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Sun, 24 May 2020 03:14 PM IST
सार

  • मकान मालिकों से अपील, वक्त बदल जाएगा पर आप इंसानियत जिंदा रखिए 
  • मजदूर बोले- एक बार घर पहुंच गए तो दोबारा लौटकर नहीं आएंगे

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Migrant people shared their painful experiences of lockdown
प्रवासी लोग। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

डेराबस्सी में मेरा पत्थर लगाने का काम था जो 3 महीनों से बंद पड़ा है। सोचा था कि लॉकडाउन खुलेगा तो काम चल जाएगा लेकिन लॉकडाउन बढ़ता ही जा रहा है। पिछले 3 महीनों तक कमरा किराए पर लिया हुआ था और काम न होने की वजह से जब मकान खाली करने के लिए मालिक से बात की तो उसने 3 महीनों का किराया लेने के बाद ही सामान उठाने दिया। ये कहना है कि बिहार के अररिया जिला निवासी विनोद कुमार का। 

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विनोद ने बताया वे पत्थर लगाने का काम करते हैं। लोगों में दया भावना तो बिल्कुल खत्म हो चुकी है, क्योंकि जब काम ही नहीं चल रहा तो हम लोग किराया कैसे दें। जैसे-तैसे करके घर से रुपये मंगवाकर मकान मालिक को दिए इसके बाद सामान उठाने दिया। 25 साल से यहां काम के सिलसिले में आते-जाते रहते हैं। कोरोना वायरस जैसी महामारी से उनके कारोबार पर भी असर पड़ा है। आने वाला समय अब बदलाव वाला होगा, वो कैसा होगा ये समय पर निर्भर करेगा। 
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विनोद के साथ काम करने वाले मजदूर गुड्डू और गुरदेव ने बताया कि दिहाड़ी न मिलने की वजह से दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है। सरकार से जो राशन मिला, उसी के साथ गुजारा कर रहे हैं। अब काम ही नहीं रहा तो बेकार बैठकर यहां क्या करेंगे। इसलिए शनिवार को राधा स्वामी सत्संग भवन पहुंचे हैं, जहां से प्रशासन द्वारा उन्हें अपने घर सही सलामत पहुंचा दिया जाएगा।

मैं डेराबस्सी में हलवाई का काम करता हूं। महीने का 10 से 15 हजार मिल जाता था उसी में अपना गुजारा करके बाकी पैसे घर भेज देता था। परंतु पिछले 2 महीनों से कोई काम नहीं मिल रहा है, इसलिए अब वापस जाने का मन बनाया है। -बृजेश कुमार, हलवाई।

 

लोगों को मुसीबत की इस घड़ी में एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिए, ताकि इस महामारी को खत्म किया जा सके। परंतु लोगों ने इस दौरान भी अपने फायदे ढूंढने शुरू कर दिए हैं। हर चीज को महंगे दामों पर बेचा जा रहा है। -विनोद कुमार

 

दिहाड़ी पर काम करते हैं और पिछले 3 महीनों से कोई काम नहीं किया। सोचकर आए थे कि काम करेंगे लेकिन लॉकडाउन के बाद खाने-पीने को लेकर ही संघर्ष करना पड़ रहा है। अब वापस जा रहे हैं और लौटकर दोबारा नहीं आएंगे। -गुड्डू और गुरदेव, दिहाड़ीदार

 

फरवरी में काम की तलाश में यहां आया था लेकिन लॉकडाउन के बाद काम तो दूर यहां तो खाने-पीने को लेकर परेशान होना पड़ रहा है। घर से पैसे मंगवाकर मकान मालिक को दिए, जिसके बाद ही मालिक ने सामान उठाने दिया। -लकड़ू राय, हलवाई।

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