कैप्टन और बाजवा के लिए चुनाव के असली मायने
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दोनों को ही पार्टी में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए अपने अपने मोर्चे पर बड़ी जंग लड़नी पड़ेगी। इस महायुद्ध में जो जीतेगा वही आज का सिकंदर कहलाएगा। कैप्टन अमरिंदर सिंह को अमृतसर से और बाजवा को गुरदासपुर से मैदान में उतारा गया है।
दिलचस्प मुकाबला बठिंडा लोकसभा सीट के लिए
यूं तो पंजाब में सबसे दिलचस्प मुकाबला बठिंडा लोकसभा सीट के लिए होगा जहां से मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की पुत्रवधू हरसिमरत कौर बादल और उनके भतीजे मनप्रीत सिंह बादल के बीच ‘करो या मरो’ की जंग लड़ी जाएगी पर कांग्रेस ने आखिरी मौके पर जो पासा फेंका है उसने पंजाब की राजनीतिक फिजा में भूचाल ला दिया है।
कैप्टन अमरिंदर को जहां अमृतसर में भाजपा के दिग्गज नेता अरुण जेटली से लोहा लेना पड़ेगा वहीं उनके लिए बड़ी चुनौती यह भी रहेगी के वे खुद को बाजवा के मुक़ाबले बेहतर व लोकप्रिय नेता साबित कर सकें। कैप्टन अमरिंदर ने कभी भी बाजवा को पार्टी अध्यक्ष के रूप में मान्यता नहीं दी और इस बारे में अपनी बयानबाजी को लेकर वे हमेशा चर्चा में रहे।
हाईकमान के फैसले पर सवाल
बाजवा के अध्यक्ष बनते ही उन्होंने पार्टी हाईकमान के फैसले पर सवाल उठाया और बोले थे कि अगर उनसे पूछा जाता तो वे बेहतर उम्मीदवार का नाम सुझाते।
उन्होंने पंजाब कांग्रेस की ओर से शुरू किए नशा विरोधी आंदोलन में की जा रही सीबीआई की जांच का भी विरोध किया और हाल में उनके खेमे में समझे जाते कुछ कांग्रेस विधायक भी अकाली दल में शामिल हुए। इसे बाजवा के खिलाफ साजिश भी समझा गया।
सभी सीनियर नेता लोकसभा चुनाव लड़ें
बाजवा ने कैप्टन अमरिंदर को फंसाने के लिए ही पार्टी को यह सुझाव दिया था के पार्टी के सभी सीनियर नेता लोकसभा चुनाव लड़ें। उन्होंने कैप्टन अमरिंदर के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री बीबी राजिंदर कौर भट्टल का नाम सुझाया था।
बाजवा कैप्टन को बठिंडा में बादल परिवार के साथ उलझाना चाहते थे जहां से उनके बेटे रणइंदर सिंह 2009 में हरसिमरत कौर से बुरी तरह हार गए थे। बाजवा की यह योजना तो कामयाब नहीं हुई लेकिन वे अमरिंदर को अमृतसर में फंसाने में कामयाब हो गए।
समझा जाता है बाजवा ने सोनिया गांधी के सियासी सलाहकार अहमद पटेल की मदद से यह चक्रव्यूह रचा। इससे पहले बाजवा खुद अपने बिछाए जाल में फंस गए थे। उन्हें गुरदासपुर सीट से चुनाव लड़ने को कहा गया।
गुरदासपुर से चुनाव जीतना आसान नहीं
बाजवा के लिए गुरदासपुर से चुनाव जीतना इतना आसान नहीं रहेगा क्योंकि अपनी सीट के अलावा उन्हें दूसरी सीटों पर भी चुनाव प्रचार के लिए जाना पड़ेगा।
यही सूरत कैप्टन अमरिंदर की भी होगी। हालांकि अमरिंदर की मौजूदगी ने अरुण जेटली के लिए भी राह कठिन कर दी है। बठिंडा के अलावा अमृतसर ऐसी सीट है जहां बादल परिवार की इज़्ज़त दांव पर लगी हुई है।
बादल ने तो आवेश में आकर यहां तक कह दिया कि अगर अरुण जेटली जीत जाते हैं तो वे उप प्रधानमंत्री बन सकते हैं। शिरोमणि अकाली दल के अलावा भाजपा के लिए भी अमृतसर सीट बहुत महत्वपूर्ण है। बादल द्वारा जेटली को अमृतसर से जिताने के ठोस वादे के बाद ही जेटली यहां से चुनाव लड़ने को राज़ी हुए हैं।
परनीत के दोबारा जीतने की संभावना
कैप्टन अमरिंदर की पत्नी परनीत कौर के पटियाला से दोबारा चुनाव जीतने की संभावना है। इस सीट को लेकर भी कैप्टन अमरिंदर सिंह के कंधों पर जि़म्मेदारी होगी।
कैप्टन और बाजवा जमीन पर तो अपने प्रत्याशी से सीधी लड़ाई लड़ते नज़र आएंगे लेकिन पर्दे के पीछे उनमें चल रहा शीत युद्ध भी जारी रहेगा। कांग्रेस आलाकमान को डर इस बात का होना चाहिए के कहीं दो दिग्गजों की लड़ाई में पार्टी पंजाब में चारों खाने चित ना हो जाए।
श्री आनंदपुर साहिब से रवनीत सिंह बिट्टू को बदलकर साबका केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी को उतारना और लुधियाना से केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी का मैदान छोड़कर भागना शुभ संकेत नही है। पार्टी द्वारा टिकटों के बंटवारे में की जा रही देरी भी कांग्रेस को भारी पड़ सकती है।