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चुनाव परिणाम 2019: जीतेगी नहीं, पर कईं का खेल बिगाड़ेगी बसपा, मजबूती से किया था प्रचार
Thu, 23 May 2019 01:01 PM IST
खुशबू गोयल
अखिल तलवार, अमर उजाला, चंडीगढ़
अखिल तलवार, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 23 May 2019 01:01 PM IST
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मायावती
- फोटो : फाइल फोटो
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सियासी विश्लेषकों की नजरें इस बार बहुजन समाज पार्टी पर लगी हैं। वह जीतने की स्थिति में तो नहीं है। लेकिन उसको मिलने वाले वोट किसी का भी खेल बिगाड़ सकते हैं। बसपा ने अपने तीनों हलकों में बहुत मजबूती से चुनाव लड़ा है। बसपा और अन्य पार्टियों ने मिलकर सुखपाल खैरा की अगुवाई में पंजाब डेमोक्रेटिक अलायंस बनाया था। जिसमें तीन सीटों पर बसपा चुनाव लड़ी है।
पार्टी ने जालंधर से बलविंदर कुमार, होशियारपुर से खुशी राम और आनंदपुर साहिब से विक्रम सोढी को खड़ा किया था। तीनों ही हलकों में बसपा का अपना कैडर वोट है। जो पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को ट्रांसफर हो गया था। लेकिन इस बार पार्टी ने शायद पहली बार पूरी ताकत से चुनाव लड़ा। तीनों हलकों के शहरी इलाकों तक में पहली बार बसपा के बूथ नजर आए।
बलविंदर कुमार और विक्रम सोढी के हलकों में प्रचार काफी मजबूत रहा। उधर, होशियारपुर में पार्टी का कैडर वोट ज्यादा है। बसपा को सबसे बड़ा फायदा पीडीए के गठबंधन में रहने से हुए। आप के बिखराव के बाद उसकी मदद करने वाले एनआरआई इस बार खैरा के साथ थे। उन्होंने हर तरह से खैरा की मदद की। इसी का फायदा दोआबा में बसपा को हुआ।
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यहां एनआरआईज ने बसपा उम्मीदवारों की आर्थिक मदद की, अपने गांवों में फोन कर वोट भी दिलवाए। पार्टी को घरों से भी एक-एक हजार से लेकर अच्छा चंदा मिला।
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पार्टी ने जालंधर से बलविंदर कुमार, होशियारपुर से खुशी राम और आनंदपुर साहिब से विक्रम सोढी को खड़ा किया था। तीनों ही हलकों में बसपा का अपना कैडर वोट है। जो पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को ट्रांसफर हो गया था। लेकिन इस बार पार्टी ने शायद पहली बार पूरी ताकत से चुनाव लड़ा। तीनों हलकों के शहरी इलाकों तक में पहली बार बसपा के बूथ नजर आए।
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बलविंदर कुमार और विक्रम सोढी के हलकों में प्रचार काफी मजबूत रहा। उधर, होशियारपुर में पार्टी का कैडर वोट ज्यादा है। बसपा को सबसे बड़ा फायदा पीडीए के गठबंधन में रहने से हुए। आप के बिखराव के बाद उसकी मदद करने वाले एनआरआई इस बार खैरा के साथ थे। उन्होंने हर तरह से खैरा की मदद की। इसी का फायदा दोआबा में बसपा को हुआ।
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यहां एनआरआईज ने बसपा उम्मीदवारों की आर्थिक मदद की, अपने गांवों में फोन कर वोट भी दिलवाए। पार्टी को घरों से भी एक-एक हजार से लेकर अच्छा चंदा मिला।
बसपा नेता खुद मान रहे हैं कि एससी ही नहीं, सामान्य वर्ग के लोगों ने उनकी मदद की है। अगर किसी ने आर्थिक मदद की है तो वोट भी डाले होंगे। आर्थिक मजबूती के चलते कैंपेन भी मजबूत हो गई। यह तय है बसपा तीनों हलकों में अच्छे वोट लेकर जाएगी। अब तक का इतिहास यही रहा है कि बसपा के ज्यादा वोट ले जाने से कांग्रेस को ही नुकसान होता है।
सियासी हलकों में चर्चा रहती है कि शिअद प्रधान सुखबीर बादल ने इसी रणनीति के तहत 2012 में बसपा को सभी 117 हलकों में उम्मीदवार खड़े करने को कहा। कहते हैं कि सुखबीर ने फंडिंग भी की थी। बसपा को पहले शिअद की बी-टीम भी कहा जाता था। इसलिए इन हलकों में बसपा को अच्छे वोट मिलना कांग्रेस के लिए चिंता की बात हो सकती है।
2017 में मिले थे 1.5 फीसदी वोट
बसपा का आधार पंजाब में लगातार सिकुड़ता जा रहा है। 2017 में बसपा को सिर्फ 1.5 फीसदी वोट मिले थे। पार्टी सभी 117 सीटों पर लड़ी थी। लेकिन सिर्फ तत्कालीन प्रदेश प्रधान अवतार सिंह करीमपुरी फिल्लौर से अपनी जमानत बचा पाए थे, वह भी चौथे स्थान पर रहे थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 4.29 फीसदी वोट मिले थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का कैडर वोट आप को चला गया था, पार्टी को सिर्फ 1.9 फीसदी वोट पड़े थे।
सियासी हलकों में चर्चा रहती है कि शिअद प्रधान सुखबीर बादल ने इसी रणनीति के तहत 2012 में बसपा को सभी 117 हलकों में उम्मीदवार खड़े करने को कहा। कहते हैं कि सुखबीर ने फंडिंग भी की थी। बसपा को पहले शिअद की बी-टीम भी कहा जाता था। इसलिए इन हलकों में बसपा को अच्छे वोट मिलना कांग्रेस के लिए चिंता की बात हो सकती है।
2017 में मिले थे 1.5 फीसदी वोट
बसपा का आधार पंजाब में लगातार सिकुड़ता जा रहा है। 2017 में बसपा को सिर्फ 1.5 फीसदी वोट मिले थे। पार्टी सभी 117 सीटों पर लड़ी थी। लेकिन सिर्फ तत्कालीन प्रदेश प्रधान अवतार सिंह करीमपुरी फिल्लौर से अपनी जमानत बचा पाए थे, वह भी चौथे स्थान पर रहे थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 4.29 फीसदी वोट मिले थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का कैडर वोट आप को चला गया था, पार्टी को सिर्फ 1.9 फीसदी वोट पड़े थे।