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लोकसभा चुनाव 2019: हरियाणा में अब इम्तिहान की घड़ी, देखते हैं कौन बनेगा सबसे बड़ा खिलाड़ी
Sat, 11 May 2019 11:32 AM IST
खुशबू गोयल
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 11 May 2019 11:32 AM IST
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फाइल फोटो
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हरियाणा में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर प्रचार का शोर शुक्रवार शाम को थम गया। 12 मई को सूबे की 10 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव होगा और 23 मई को नतीजे सामने होंगे। इस चुनावी रण में राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय मान्यता प्राप्त व पंजीकृत पार्टियों के अलावा बतौर आजाद 223 प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं।
इस चुनावी जंग में सभी प्रत्याशी, उनके समर्थक व स्टार प्रचारक जीत के लिए खूब पसीना बहा चुके हैं। अब देखना यह है कि हरियाणा के रण में कड़े मुकाबले के बाद सबसे बड़ा खिलाड़ी कौन बनता है। हरियाणा भले ही देश का छोटा सूबा है, मगर राजनीतिक दृष्टि से बड़ा महत्व रखता है।
दिल्ली से सटे होने की वजह से केंद्र की सियासत में भी हरियाणा का पूरा दखल रहता है। इसी वजह से इस बार भी हरियाणा में चुनाव लड़ रही विभिन्न पार्टियों के लिए लोकसभा में जीत कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है। चुनाव लड़ रही तमाम पार्टियों के लिए यह जीत न केवल उनका भविष्य तय करेगी, बल्कि कई दिग्गजों और दलों के लिए यह चुनाव वर्चस्व व वजूद की भी जंग है।
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इस बार हरियाणा के लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है। इसके अलावा क्षेत्रीय दल इनेलो, जजपा-आप गठबंधन और बसपा-लोसुपा गठबंधन चुनावी रण को रोचक बना रहे हैं।
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इस चुनावी जंग में सभी प्रत्याशी, उनके समर्थक व स्टार प्रचारक जीत के लिए खूब पसीना बहा चुके हैं। अब देखना यह है कि हरियाणा के रण में कड़े मुकाबले के बाद सबसे बड़ा खिलाड़ी कौन बनता है। हरियाणा भले ही देश का छोटा सूबा है, मगर राजनीतिक दृष्टि से बड़ा महत्व रखता है।
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दिल्ली से सटे होने की वजह से केंद्र की सियासत में भी हरियाणा का पूरा दखल रहता है। इसी वजह से इस बार भी हरियाणा में चुनाव लड़ रही विभिन्न पार्टियों के लिए लोकसभा में जीत कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है। चुनाव लड़ रही तमाम पार्टियों के लिए यह जीत न केवल उनका भविष्य तय करेगी, बल्कि कई दिग्गजों और दलों के लिए यह चुनाव वर्चस्व व वजूद की भी जंग है।
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इस बार हरियाणा के लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है। इसके अलावा क्षेत्रीय दल इनेलो, जजपा-आप गठबंधन और बसपा-लोसुपा गठबंधन चुनावी रण को रोचक बना रहे हैं।
इस चुनाव में भाजपा का परचम सीएम मनोहर लाल के हाथ में हैं। सभी दस सीटों के समीकरणों को साधते हुए भाजपा ने अपने धुरंधर मैदान में उतारे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में 10 सीटों में से भाजपा ने 7 सीटें जीती थीं। मगर इस बार भाजपा ‘मिशन 10’ लेकर बढ़ रही है।
भाजपा के लिए अपने मौजूदा वर्चस्व को बरकरार रखते हुए दस की दस सीटें जीतना बड़ी चुनौती और मनोहर की साख का सवाल है। भाजपा इस बार भी प्रत्याशी के आगे मोदी की इमेज को रखते हुए मतदाताओं के बीच है।
दूसरी ओर, चुनाव में कांग्रेस की कमान पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथ में हैं। वह खुद सोनीपत सीट से प्रत्याशी हैं, लेकिन अन्य सीटों पर भी अपने प्रत्याशियों की जीत के लिए जोर लगा रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते कांग्रेस सिर्फ 1सीट रोहतक जीती थी।
इस बार भी धड़ों में बंटी कांग्रेस के लिए मोदी लहर के बावजूद करिश्मा दिखाते हुए 2004 व 2009 का इतिहास (10 में से 9-9 सीटें जीती थी) दोहराने की बड़ी चुनौती है। मगर इस चुनाव में सोनीपत और रोहतक सीट को छोड़कर हर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशियों के समक्ष अलग-अलग समीकरण हैं।
भाजपा के लिए अपने मौजूदा वर्चस्व को बरकरार रखते हुए दस की दस सीटें जीतना बड़ी चुनौती और मनोहर की साख का सवाल है। भाजपा इस बार भी प्रत्याशी के आगे मोदी की इमेज को रखते हुए मतदाताओं के बीच है।
दूसरी ओर, चुनाव में कांग्रेस की कमान पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथ में हैं। वह खुद सोनीपत सीट से प्रत्याशी हैं, लेकिन अन्य सीटों पर भी अपने प्रत्याशियों की जीत के लिए जोर लगा रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते कांग्रेस सिर्फ 1सीट रोहतक जीती थी।
इस बार भी धड़ों में बंटी कांग्रेस के लिए मोदी लहर के बावजूद करिश्मा दिखाते हुए 2004 व 2009 का इतिहास (10 में से 9-9 सीटें जीती थी) दोहराने की बड़ी चुनौती है। मगर इस चुनाव में सोनीपत और रोहतक सीट को छोड़कर हर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशियों के समक्ष अलग-अलग समीकरण हैं।
भाजपा और कांग्रेस के अलावा हरियाणा में कुछ सियासी दल ऐसे हैं, जिनका भविष्य लोकसभा चुनाव की यह जीत तय करेगी। इन दलों में सबसे पहले हैं इनेलो और जननायक जनता पार्टी (जजपा)। छह महीने पहले चौटाला परिवार के विघटन के दौरान इनेलो टूट गई और जजपा बनी। अब दोनों ही पार्टियों ने सभी सीटों पर अपने-अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हुए हैं।
पिछली लोकसभा चुनाव में इनेलो ने 2 सीटें जीती थी। लेकिन अब इनेलो की ताकत और वोटबैंक बिखर चुका है। इनेलो अकेले मैदान में हैं, जबकि जजपा ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन किया है। ऐसे में जीत ही इन दलों का भविष्य तय करेगी। इसके अलावा बसपा-लोसुपा गठबंधन का वजूद भी लोकसभा चुनाव की जीत पर टिका है।
लोकतांत्रिक सुरक्षा पार्टी (लोसुपा) भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी ने ओबीसी मतदाताओं को टारगेट करते हुए पार्टी बनाई। जबकि बसपा एससी मतदाताओं की सियासत करती है। दोनों दलों ने अपने गठबंधन से पिछड़े और अनुसूचित जाति मतदाताओं को साधने का काम किया है। मगर देखना हये है कि लोकसभा चुनाव के नतीजे उनके समीकरणों को जीत में कैसे बदलते है। जीत ही इस गठबंधन का वजूद तय करेगी।
पिछली लोकसभा चुनाव में इनेलो ने 2 सीटें जीती थी। लेकिन अब इनेलो की ताकत और वोटबैंक बिखर चुका है। इनेलो अकेले मैदान में हैं, जबकि जजपा ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन किया है। ऐसे में जीत ही इन दलों का भविष्य तय करेगी। इसके अलावा बसपा-लोसुपा गठबंधन का वजूद भी लोकसभा चुनाव की जीत पर टिका है।
लोकतांत्रिक सुरक्षा पार्टी (लोसुपा) भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी ने ओबीसी मतदाताओं को टारगेट करते हुए पार्टी बनाई। जबकि बसपा एससी मतदाताओं की सियासत करती है। दोनों दलों ने अपने गठबंधन से पिछड़े और अनुसूचित जाति मतदाताओं को साधने का काम किया है। मगर देखना हये है कि लोकसभा चुनाव के नतीजे उनके समीकरणों को जीत में कैसे बदलते है। जीत ही इस गठबंधन का वजूद तय करेगी।