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गजब प्रत्याशी: लोग इन्हें पुकारते थे ‘धरतीपकड़’, और ये कहते थे- चुनाव में खड़ा हूं मुझे हरा देना

Mon, 06 May 2019 11:52 AM IST
खुशबू गोयल मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Mon, 06 May 2019 11:52 AM IST
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Lok Sabha Elections 2019, Dharatipakad kaka joginder singh role in indian politics
काका जोगिंद्र सिंह
देश की राजनीति में ‘धरतीपकड़’ नाम से मशहूर काका जोगिंद्र सिंह ने हरियाणा की सियासी धरती पर भी अपने जौहर दिखाए हैं। देश में गजब ढंग से चुनाव लड़ने वाला यह अजब शख्स हरियाणा में भी दो सीटों पर जीतने के लिए नहीं हारने के लिए चुनाव लड़ा था। इनका चुनाव के दौरान प्रचार का तरीका भी अनोखा था। काका पैदल या साइकिल पर निकलते थे और लोगों से कहते फिरते थे कि मैं चुनाव में खड़ा हूं, मगर मेहरबानी करके मुझे वोट न देना।
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चुनाव लड़ने और फिर हारने की अपील के पीछे काका की सोच कुछ अलग ही थी। काका जोगिंद्र सिंह वैसे तो संयुक्त हिंदुस्तान के गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में 1918 पैदा हुए थे। लेकिन बंटवारे के बाद काका  परिवार समेत उतर प्रदेश के बरेली में बस गए। उसके बाद काका जोगिंद्र सिंह ने 1962 से हर चुनाव में खडे़ होने की ठान ली। उन्होंने विभिन्न राज्यों की कई सीटों से करीब 300 बार चुनाव के लिए नामांकन भरा था।
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अपनी इसी आदत की वजह से काका इतने प्रख्यात हुए कि एक बार तो देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी काका को उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में बतौर सिख चेहरा मैदान में उतरने को कहा था। लेकिन काका ने यह प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए किसी भी राजनीतिक पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। काका हमेशा आजाद प्रत्याशी ही एक ही चुनाव में कई-कई सीट से नामांकन भरते थे। सन 1998 में काका का निधन हो गया था।
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...जब रोहतक, भिवानी सीट से लड़ा चुनाव

काका जोगिंद्र सिंह 73 साल के हो चुके थे। लेकिन चुनाव लड़ने का सिलसिला जारी था। इसी के चलते 1991 में काका जोगिंद्र सिंह ‘धरती पकड़’ ने हरियाणा का रुख किया और रोहतक व भिवानी सीट से लोकसभा चुनाव नामांकन दाखिल कर दिया। भिवानी में काका को कुल 596369 वोटों में से सिर्फ 785 यानी 0.14 प्रतिशत वोट ही मिल पाए थे।

यहां से हरियाणा विकास पार्टी के जंगबीर सिंह चुनाव जीते थे। इसी चुनाव में दूसरी सीट रोहतक से भी कामा धरपकड़ ने नामांकन भरा था और काका वहां से भी चुनाव लड़ रहे थे। रोहतक में काका को कुल 564886 वोट में से सिर्फ 900 यानी 0.16 प्रतिशत वोट ही मिले थे। कांग्रेस के भूपेंद्र सिंह हुड्डा यहां से पूर्व उपप्रधानमंत्री देवी लाल को हराकर चुनाव जीते थे।

सोच थी, हार कर जमानत राशि जब्त होगी और देश के काम आएगी
हरियाणा में राजनीतिक मामलों के जानकार डॉ. आरआर मलिक के अनुसार बार-बार चुनाव लड़ने और हारने के पीछे काका की सोच कुछ अलग थी। काका सोचते थे कि वे जितनी बार हारेंगे, उतनी बार उनकी जमानत राशि जब्त होगी और राष्ट्रीय कोष में जाएगी। इतना ही नहीं हारने के बाद वे लोगों को खुशी से मेवा और मिश्री खिलाकर मुंह भी मीठा करवाते थे।

इसलिए पड़ा धरतीपकड़ नाम
दरअसल, धरतीपकड़ एक कुश्ती का दांव है। इसमें हारता हुआ चित पहलवान जमीन पर आत्मविश्वास के साथ ऐसे चिपक जाता है, जैसे उसने धरती पकड़ ली हो। मगर पिछले कई सालों से राजनीति में इस शब्द का इस्तेमाल होने लगा। यह शब्द उन लोगों के पीछे लगाया गया, जो बहुत बार चुनाव हारे, लेकिन फिर भी उन्होंने चुनाव लड़ने का सिलसिला इस तरह जारी रखा, जैसे उनके आत्मविश्वास ने मानो धरती पकड़ रखी हो।
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