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लोकसभा चुनाव 2019: अब तक बाहरी के टैग से जूझ रहे हैं हरदीप पुरी, कांग्रेस बना रही मुद्दा
Mon, 13 May 2019 11:52 AM IST
खुशबू गोयल
अखिल तलवार, अमर उजाला, चंडीगढ़
अखिल तलवार, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 13 May 2019 11:52 AM IST
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हरदीप पुरी
- फोटो : amar ujala
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एक सिख होने के बावजूद केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी अब तक बाहरी के टैग से जूझ रहे हैं। भाजपा के चुनाव प्रचार में यह मुद्दा चिंता का विषय है। लेकिन पुरी भी अपनी दलीलों से इस धारणा को तोड़ने में लगे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार अरुण जेटली के लिए भी बाहरी होने का मुद्दा मुसीबत बना था। उनके मुकाबले खड़े कैप्टन अमरिंदर सिंह की कैंपेन टीम ने इस मुद्दे को पुरजोर ढंग से उछाला था। कांग्रेस सभाओं में यही कहते थे कि जेटली बाबू चुनाव के बाद दिल्ली चले जाएंगे।
वहीं, पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल ने इस बात पर वोट मांगे थे कि जेटली जीते तो उनका वित्तमंत्री बनना तय है। लेकिन कांग्रेसी अपना नैरेटिव सेट करने में कामयाब हो गए और जेटली की करारी हार हुई थी। पुरी के सामने भी यही समस्या आ रही है। कांग्रेस इस बार भी इसी मुद्दे को हथियार बना रही है कि पुरी का अमृतसर से कोई लेना-देना नहीं है, चुनाव के बाद चले जाएंगे। लेकिन जेटली की हार के बाद भाजपा सजग है। रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट भी इसके लिए पूरा होमवर्क करके आए हैं।
बाहरी के सवाल पर वह दलील देते हैं कि सौ साल पहले जलियांवाला बाग नरसंहार के समय उनके नाना वहां मौजूद थे, फिर वह बाहरी कैसे हो सकते हैं। बंटवारे के बाद भी उनका परिवार पहले अमृतसर आया था। पुरी यह तर्क भी देते हैं कि राहुल गांधी वायनाड से चुनाव लड़ सकते हैं तो वह अमृतसर से क्यों नहीं।
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वहीं, पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल ने इस बात पर वोट मांगे थे कि जेटली जीते तो उनका वित्तमंत्री बनना तय है। लेकिन कांग्रेसी अपना नैरेटिव सेट करने में कामयाब हो गए और जेटली की करारी हार हुई थी। पुरी के सामने भी यही समस्या आ रही है। कांग्रेस इस बार भी इसी मुद्दे को हथियार बना रही है कि पुरी का अमृतसर से कोई लेना-देना नहीं है, चुनाव के बाद चले जाएंगे। लेकिन जेटली की हार के बाद भाजपा सजग है। रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट भी इसके लिए पूरा होमवर्क करके आए हैं।
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बाहरी के सवाल पर वह दलील देते हैं कि सौ साल पहले जलियांवाला बाग नरसंहार के समय उनके नाना वहां मौजूद थे, फिर वह बाहरी कैसे हो सकते हैं। बंटवारे के बाद भी उनका परिवार पहले अमृतसर आया था। पुरी यह तर्क भी देते हैं कि राहुल गांधी वायनाड से चुनाव लड़ सकते हैं तो वह अमृतसर से क्यों नहीं।
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राष्ट्रीय पार्टियों में कहीं से भी किसी को लड़ाया जा सकता है, इसमें बाहरी का कोई मुद्दा नहीं है। आखिर में वह भावुक दलील देते हैं कि उन्हें गुरु नगरी की सेवा की जिम्मेदारी मिली है, इसे पूरी ईमानदारी से निभाएंगे। चुनाव लड़ने से काफी पहले भी उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार गुरजीत औजला द्वारा गोद लिए गांव मूदल में सड़क बनवाई।
अगर वह अमृतसर का प्रतिनिधित्व करेंगे तो शहर के लिए सब कुछ करेंगे। वहीं, कांग्रेसी तर्क देते हैं कि अगर उन्हें शहर की इतनी चिंता थी तो मंत्री बनने के बाद से अब तक कुछ करते। इस बार भाजपाइयों के तरकश में एक और तीर है। वे लोगों को यह समझाने में लगे हैं कि जेटली वाली गलती इस बार न करना। क्योंकि एनडीए सत्ता में आई तो पुरी का मंत्री बनना तय ही है।
संघ ने लिया था फीडबैक
पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक महत्वपूर्ण बैठक अमृतसर में हुई थी। तब भाजपा अमृतसर से उम्मीदवार को लेकर पसोपेश में थी। संघ की बैठक में भी इस पर मंथन किया गया। जिसके बाद संघ ने अमृतसर के लोगों से फीडबैक लिया था कि उम्मीदवार कैसा होना चाहिए, स्थानीय या बाहरी। सूत्रों के मुताबिक लोगों ने स्थानीय उम्मीदवार की हिमायत की थी। लेकिन भाजपा के पास स्थानीय कद्दावर उम्मीदवार नहीं था, गुटबाजी भी समस्या थी।
अगर वह अमृतसर का प्रतिनिधित्व करेंगे तो शहर के लिए सब कुछ करेंगे। वहीं, कांग्रेसी तर्क देते हैं कि अगर उन्हें शहर की इतनी चिंता थी तो मंत्री बनने के बाद से अब तक कुछ करते। इस बार भाजपाइयों के तरकश में एक और तीर है। वे लोगों को यह समझाने में लगे हैं कि जेटली वाली गलती इस बार न करना। क्योंकि एनडीए सत्ता में आई तो पुरी का मंत्री बनना तय ही है।
संघ ने लिया था फीडबैक
पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक महत्वपूर्ण बैठक अमृतसर में हुई थी। तब भाजपा अमृतसर से उम्मीदवार को लेकर पसोपेश में थी। संघ की बैठक में भी इस पर मंथन किया गया। जिसके बाद संघ ने अमृतसर के लोगों से फीडबैक लिया था कि उम्मीदवार कैसा होना चाहिए, स्थानीय या बाहरी। सूत्रों के मुताबिक लोगों ने स्थानीय उम्मीदवार की हिमायत की थी। लेकिन भाजपा के पास स्थानीय कद्दावर उम्मीदवार नहीं था, गुटबाजी भी समस्या थी।