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बच्ची की आंखों में छलका भूख का दर्द, मां बोली- दूध उतर नहीं रहा है, इस मासूम को क्या पिलाऊं

Thu, 21 May 2020 01:42 PM IST
खुशबू गोयल दीपक शाही, जीरकपुर
दीपक शाही, जीरकपुर Published by: खुशबू गोयल Updated Thu, 21 May 2020 01:42 PM IST
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Lockdown, Coronavirus, Migrant Workers, A Mother's Emotional Story
आठ महीने के भाई को गोद में संभालती मासूम बच्ची - फोटो : अमर उजाला
देवांशी अपने छोटे भाई अंकित को संभाल, दूध उतर नहीं रहा, अपने लाडले आठ महीने के मासूम को क्या पिलाऊं। अभी थोड़ी देर में दूध लेकर आती हूं... शायद कोई दुकानदार हमारे मुन्ना के लिए एक पैकेट दूध बिना पैसे लिए दे दे। पिछले पांच दिन से इसे दूध नहीं पिला पाई हूं और सूखे चावल को पानी में भिगोकर कब तक इसका गला तर करती रहूं। रात को इसे भूख से बिलखते देखती हूं...तो कभी अपनी किस्मत तो कभी अपने आप को कोसती हूं।
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यह बातें बड़बड़ाते हुए प्रवासी श्रमिक कविता ने अपनी चार साल की बेटी से कही। कविता का पति लॉकडाउन से पहले ही किसी काम से यूपी के हरदोई में गया था और फिर सभी रेलगाड़ियां और अन्य साधन बंद होने के कारण लौट कर नहीं आया। कविता अपने पति के साथ कामकाज की तलाश में पहले चंडीगढ़ आई थी और फिर वहां से जीरकपुर के पीर मुछल्ला में विक्टोरिया हाइट्स के नजदीक रह रही थी। अब अपने बच्चों के साथ यूपी लौट रही है।
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कविता सोचते हुए बोली.... क्यों आई थी मैं चंडीगढ़ में, अच्छा भला अपने गांव में ही खेतों में काम कर लेती तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता। इसमें मेरे लाडले का कोई कसूर नहीं है। कसूरवार तो हम ही हैं, जो चार माह पहले यहां काम की तलाश में आए थे। सोचा था इसे पढ़ा लिखाकर आगे इसका अच्छा भविष्य बना सकें। क्या पता था कि इस कोरोना काल में लॉकडाउन लग जाएगा और ऐसे सारे काम बंद हो जाएंगे कि यहां दर-दर की ठोकरें खानी पड़ेंगी।
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गोद में अपने छोटे भाई को पकड़े अपनी मां की बात देवांशी समझ रही थी, लेकिन उसके मन में यह डर भी था कि मां यह शहर छोड़कर जाएगी तो अकेले चंडीगढ़-अंबाला हाईवे किनारे लंबे रास्ते पर कैसे अपने छोटे भाई को संभालेगी। क्योंकि खुद वह चार साल की है और फिर भी उसने अपने भाई को मां के लौटने तक सिने से लगाकर रखा....।
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