पंजाब: शूरवीरों की धरती पर जलियांवाला बाग का इतिहास भी और साइंस म्यूजियम की आधुनिकता भी
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विस्तार
भारत और पाकिस्तान के बॉर्डर पर स्थित पंजाब अपने आप में एक इतिहास समेटे है। यहां से शहीद ए आजम भगत सिंह ने आजादी की लौ में अपना बलिदान दिया तो जलियांवाला बाग में हजारों लोगों की शहादत ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ झंडा बुलंद करने की अलख जगाई। जानिए पंजाब के इतिहास के बारे में
जलियांवाला बाग
इतिहास : जलियांवाला बाग स्मारक आजादी से पहले 229 मीटर लंबा और 183 मीटर चौड़ा बाग था। यहां छुट्टी वाले दिन या अन्य दिनों में लोग इकट्ठा होते थे। 13 अप्रैल 1919 को वैशाखी वाले दिन लोग अंग्रेज साम्राज्य के खिलाफ विरोध सभा करने इकट्ठे हुए। बाग में प्रवेश करने और निकलने का एक ही तंग रास्ता था। सायं करीब 4.30 बजे यहां भारी जलसा हो रहा था कि जनरल डायर 50 सैनिकों के साथ बाग में दाखिल हुआ और वहां मौजूद बेकसूर लोगों पर गोलियां चलवा दीं। अंग्रेज सैनिकों ने 1633 गोलियां चलाईं, जिनसे सैकड़ों भारतीयों की मौत हो गई।हादसे के बाद पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओडवायर को भेजी अपनी रिपोर्ट में जनरल आरईएच डायर ने 200 से 300 लोगों के मारे जाने की बात कही थी। जबकि माइकल ओडवायर ने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ 200 लोगों के मरने का जिक्र किया।
क्या है खास : गोलीकांड के बाद अंग्रेजों की क्रूरता को लेकर जलियांवाला बाग पूरे देश में ही नहीं बल्कि विश्व में विख्यात हो गया और यह बाग देश की आजादी के साथ जुड़ गया। इस बाग के अंदर दीवारों पर गोलियों के निशान आज भी सुरक्षित हैं। अपनी जान बचाने के लिए कुएं में कूदे लोगों की मौत की निशानी आज भी जीवित है जलियांवाला बाग में। यहां पहुंचने वाले लोग शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करने आते हैं। हर साल 13 अप्रैल को जिला प्रशासन की ओर से यहां समागम करवाया जाता है।
आर्थिक महत्व: जलियांवाला बाग अमृतसर ही नहीं बल्कि पूरे पंजाब में आर्थिक महत्व रखता है। बाग के आसपास बहुत बड़ा बाजार है। यहां होटल उद्योग भी काफी प्रफुल्लित हुआ है। जलियांवाला बाग देखने आने वाले लोग जहां होटलों के लिए बड़ी आय का जरिया हैं। सैलानी यादगार के तौर पर आसपास की दुकानों से कुछ न कुछ अवश्य खरीदकर ले जाते हैं। सड़कों के किनारे अपनी स्टॉल लगाने वालों की रोजी रोटी देश विदेश से आने वाले सैलानियों पर टिकी है।
सैलानी : अमृतसर को गुरु की नगरी के रूप में विश्व में जाना जाता है। सचखंड श्री हरमंदिर साहिब में नतमस्तक होने यहां रोजाना करीब डेढ़ लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं। चूंकि जलियांवाला बाग सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के रास्ते में पड़ता है, तो यह श्रद्धालु या तो नतमस्तक होने से पहले या बाद में कुछ समय बाग में समय जरूर बिताते हैं और शहीदों को नमन करते हैं। अंदाजन हर साल इस बाग में 10 से 12 लाख सैलानी पहुंचते हैं।ऐसे पहुंचें : जलियांवाला बाग बस स्टैंड से मात्र 500 मीटर की दूरी पर जबकि रेलवे स्टेशन से करीब 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए सैलानियों को आटो रिक्शा, कैब की सुविधा उपलब्ध है। बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन से ऑटो या कैब में महज 7 से 10 मिनट का रास्ता है।
खटकड़ कलां
नवांशहर के अंतर्गत आते खटकड़ कलां में शहीद भगत सिंह के पूर्वज रहते थे। हालांकि भगत सिंह का जन्म पाकिस्तान में हुआ था। भगत सिंह के जन्म दिवस के 100 वर्ष पूरे होने पर 2008 में अकाली सरकार की ओर से नवांशहर जिले का नाम बदलकर शहीद भगत सिंह नगर कर दिया गया था। इसके बाद गांव में विकास की रफ्तार कुछ बढ़ी। 2009 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने खटकड़कलां में म्यूजियम निर्माण का उद्घाटन किया था। करीब 16 करोड़ रुपये में बने म्यूजियम में शहीदों से जुड़ीं यादगारें रखी गई हैं। इसके अलावा म्यूजियम में आजादी के शुरुआती दिनों से लेकर आजादी तक के तथ्यों को प्रदर्शित किया गया है। भगत सिंह की जिंदगी में झांकना हो तो यहां जरूर आएं।
क्या है खास : खटकड़कलां में शहीद-ए-आजम भगत सिंह के जीवन से जुड़ी बातों को म्यूजियम में प्रदर्शित किया गया है तथा इसके अलावा म्यूजियम के पिछले हिस्से में शहीद का पैतृक घर है, जिसे काफी संभालकर रखा गया है। खटकड़कलां पहुंचने का मुख्य मार्ग सड़क ही है। नवांशहर सिटी से 8 किलोमीटर दूरी पर स्थित खटकड़कलां के लिए मिनी बसें चलती हैं तथा जालंधर-चंडीगढ़ के लिए चलने वाली बसें जहां बेहद कम रुकती हैं, जबकि जहां पर स्पेशल बस स्टैंड बनाया गया है। हजार सैलानी हर साल खटकड़कलां म्यूजियम देखने पहुंचते हैं। सोमवार को म्यूजियम बंद रहता है। शनिवार व रविवार को ज्यादा भीड़ होती है।
कपूरथला
72 एकड़ क्षेत्रफल में फैली तिलिस्मी दुनिया
फ्लाइट सिमुलेटर: यहां ऐसी मशीन फ्लाइट सिमुलेटर है, जिसमें बैठकर ऐसा प्रतीत होता है कि आप आकाश में उड़ रहे हैं। पर यह मशीन न तो उड़ती है और न ही कहीं जाती है। फ्लाइट सिमुलेटर के साथ यहां पर एक अर्थपेक सिमुलेटर भी है, जहां बैठकर भूकंप के असली झटकों जैसा एहसास होगा। स्क्रीन पर दिखाया जाता है कि विभिन्न रिएक्टर पैमाने पर आप भूकंप को कैसे महसूस करते हैं। यहां का थ्रीडी शो भी बेमिसाल है।
सूई गिरने, बादल गरजने की आवाज
डोम स्पेस थिएटर इसकी आभा को चार चांद लगाता है। विभिन्न रंगों की करीब 25 लाख टाइलों से बनाया है। आम थियेटर से 10 गुना बड़ी स्क्रीन है। सूई गिरने से लेकर बादल गरजने तक की आवाज साफ सुनाई देती है। डिजिटल प्लैनेटेरियम से ग्रहों तारामंडल और मंदाकनियों की विस्तृत जानकारी दी जाती है।
12 फुट ऊंचे दिल की धड़कन सुनें
साइंस एक्सपलोरियम नाम की इमारत में सेहत के रहस्य खोलती एक ‘अमेजिग लीविंग मशीन’ नामक गैलरी है। इसमें घुसते ही नजर सबसे पहले 12 फुट ऊंचे दिल के एक मॉडल पर पड़ती है। इसमें दाखिल होते ही आप को दिल की धड़कन सुनाई देती है।
टापू में डायनासोर के हैं 45 मॉडल
साइंस सिटी के बीच स्थित झील में एक टापू है, जहां डायनासोर के 45 मॉडल हैं। पार्क में जाते ही लगेगा कि यह डायनासोर आपको बुला रहे हैं। इसे तीन भागों में बांटा गया है-क्रेटेशियश, ट्रेशियश और जुरासिक।
कपूरथला पैलेस - वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है सैनिक स्कूल
कपूरथला पैलेस, जहां इस समय सैनिक स्कूल है, यह वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। इसे देखने लोग दूर दूर से आते हैं, लेकिन पंजाब के पुरातत्व विभाग की अनदेखी के चलते यह इमारत जर्जर हालत में है। शहर के बीच स्थित दरबार हाल के जीर्णोद्धार का काम लगभग तीन साल से चल रहा है। यहां कपूरथला रियासत के राजा का दरबार लगता था। लकड़ी के फर्श पर चलते समय आज भी राजसी ठाठ बाट महसूस किया जा सकता है।
जुबली हॉल भी है अनूठी इमारत
1857 के गदर से पहले 1856 में स्थापित नवाब जस्सा सिंह आहलूवालिया सरकारी कालेज का जुबली हाॅल भी अनूठी इमारत है। रेलवे रोड स्थित मौरिश मस्जिद की तरह हूबहू मस्जिद मोरक्को में भी स्थापित है। कपूरथला की मौरिश मस्जिद लाल तो मोरक्को की पूरी तरह से सफेद है। विला कोठी, कपूरथला के कांजली रोड से मुश्कवेद से होते हुए विला कोठी तक पहुंचा जाता है, जहां पर आज भी कपूरथला रियासत के राजा ब्रिगेडियर सुखजीत सिंह रहते हैं, लेकिन इस कोठी का भ्रमण देखने के लिए अनुमति दिल्ली से लेनी पड़ती है।
वाघा बार्डर
भारत-पाक की अटारी-वाघा सीमा पर स्थित ज्वाइंट चेक पोस्ट (जेसीपी) विश्व भर में प्रसिद्ध है। रोजाना शाम को यहां हजारों की संख्या में लोग बीएसएफ और पाक रेंजर्स के बीच होने वाली संयुक्त परेड देखने पहुंचते हैं। बीएसएफ और पाक रेंजर्स के बीच संयुक्त परेड साल 1959 से लगातार की जा रही है, जिसे बीटिंग द रिट्रीट सेरेमनी के नाम से जानते हैं। आजादी के बाद अटारी वाघा सीमा पर दोनों तरफ ड्रम रखकर उनके ऊपर बांस लगाया गया था। लेकिन बाद में यहां कुछ ऊंची दीवार बना कर लोहे का गेट लगा दिया गया। यहां का अनुभव रोमांचक होता है।
रिट्रीट सेरेमनीः जहां दिखते हैं देशभक्ति के रंग
क्या है खास : विश्व में दो देशों के बीच अपनी तरह की यह एक ही सीमा है, जिसे ज्वाइंट चेक पोस्ट (जेसीपी) अटारी के नाम से जाना जाता है। यहां रोजाना दोनों देशों के सुरक्षा बलों के कमांडर शाम को कुछ सेकेंड के लिए मिलते हैं और हाथ मिलाते हैं। बीएसएफ और पाक रेंजर्स के जवान रोज शाम को 25 मिनट तक एक साथ परेड करके अपने-अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान सहित उतारते हैं। मौसम के अनुरूप जेसीपी पर होने वाली संयुक्त परेड का समय बदलता रहता है। बीटिंग द रिट्रीट सेरेमनी को देखने लाखों सैलानी अटारी सीमा पर पहुंचते हैं और एक अलग तरह का अनुभव अपने दिल में बसाकर ले जाते हैं।
अमृतसर को गुरु की नगरी के रूप में विश्व में जाना जाता है। जहां हर रोज सवा से डेढ़ लाख सैलानी आते हैं। इनमें से ज्यादातर सैलानी सचखंड श्री हरमंदिर साहिब में नतमस्तक होने और जलियांवाला बाग देखने के बाद अटारी बीटिंग द रिट्रीट सेरेमनी देखने जाते हैं। अटारी पर रोजाना 20 से 25 हजार सैलानी पहुंच कर देशभक्ति के रंग में सराबोर होते हैं। सैलानियों की सालाना औसतन संख्या 30 से 35 लाख है।
ऐसे पहुंचें : अंतरराष्ट्रीय सीमा अटारी अमृतसर रेलवे स्टेशन से 30 और अमृतसर बस स्टैंड से 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए सैलानियों को टैक्सी, आॅटो रिक्शा, कैब की सुविधा उपलब्ध है। सैलानी अमृतसर रेलवे स्टेशन और अमृतसर बस स्टैंड से 40 मिनट से लेकर 55 मिनट में अटारी सीमा पर पहुंच सकते हैं।
यहां ठहरें : अंतरराष्ट्रीय अटारी सीमा पर सैलानियों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं। सैलानियों को बीटिंग द रिट्रीट सेरेमनी देखने के बाद वापस अमृतसर लौटना पड़ता है। सैलानियों के लिए अमृतसर शहर में ही होटल मौजूद हैं। लोग 500 रुपये से लेकर 3000 रुपये तक प्रति रूम प्रति दिन खर्च करके यहां ठहर सकते हैं। जहां खाने-पीने की दुकानें, ढाबे और होटल हैं। जहां 100 रुपये खर्च करके अपना पेट भर सकता है। सैलानी आलू वाला कुलचा और मीठी मक्खन वाली लस्सी पीना ज्यादा पसंद करते हैं। इसके अलावा सादी दाल-रोटी और नाॅनवेज भी आसानी से उपलब्ध होता है।
पटियाला
इतिहास का आइना है किला मुबारक
पटियाला का ऐतिहासिक किला मुबारक वास्तुकला उत्तर मुगल और राजस्थान शैली का एक अद्भुत मिश्रण है। इसे 1764 में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के वंशज व पटियाला के संस्थापक बाबा आला सिंह ने कच्ची गढ़ी के रूप में बनवाया था। बाद में इसे पक्की ईंटों से पुनर्निमित किया गया था। शहर के मध्य में स्थापित किला मुबारक के विभिन्न हिस्सों में किला अंदरून, रनवास, जलाओखाना और दरबार हाल के साथ हथियारों की म्यूजियम गैलरी शामिल हैं। इस किले की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें हिमाचल प्रदेश के ज्वाला जी मंदिर से लाई ज्योति से एक अखंड जोत पिछले 250 सालों से जल रही है। मान्यता है कि जब तक यह जलती रहेगी कि पटियाला बसा रहेगा।
किला मुबारक के कई हिस्से खस्ताहाल हैं या गिर चुके हैं। सैलानी यहां सड़क व रेलमार्ग से पहुंच सकते हैं। कोई फ्लाइट से यहां आना चाहे तो सबसे नजदीक चंडीगढ़ एयरपोर्ट है। यह पटियाला शहर से करीब 61 किलोमीटर की दूरी पर है। एयरपोर्ट पर उतरने के बाद बाकी का रास्ता सड़क या रेलमार्ग से तय किया जा सकता है। अगर ट्रेन से आने की सोच रहे हैं, तो रेलवे जंक्शन राजपुरा है। इसके अलावा सड़क मार्ग से भी पटियाला पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा बसों की सुविधा भी अच्छी है। आप निजी वाहन बुक करके भी यहां पहुंच सकते हैं।
क्या है खास : किला अंदरून में पटियाला कला शैली में चित्रित हिंदू पौराणिक कथाओं के दृश्यों के साथ 13 शाही कक्ष हैं। दरबार हाल में दुर्लभ नादिर शाह की तलवार, श्री गुुरु गोबिंद सिंह जी का खंजर, ढाल, तलवार व अन्य शस्त्र और तोपें वगैरह हैं।
बठिंडा: ईंटों का सबसे पुराना स्मारक
बठिंडा में ईंटों से बना सबसे पुराना व ऊंचा स्मारक है। इसका नाम भ्ाी किला मुबारक है। करीब 1800 साल पहले भाटी राजपूत राजा बीनपाल ने इसे बनवाया था। यह वही किला है, जिसमें 1239 ई. में पहली महिला शासक रजिया सुल्ताना को उनके ही सेवक अल्तुनिया ने बंदी बना लिया था। दरअसल, रजिया सुल्ताना मुस्लिम एवं तुर्की इतिहास की पहली महिला शासक थीं। इसी वजह से इस किले को रजिया सुल्ताना किला के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा इसके और भी कई नाम हैं, जैसे बठिंडा किला, गोविंदघर, बकरामघर आदि।
जालंधर
जंग-ए-आजादी
जंग-ए-आजादी शहीद स्मारक जालंधर सिटी से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर करतारपुर कस्बे में स्थित है। आजादी के संग्राम में योगदान डालने वाले शहीदों की याद में बनाया यह स्मारक 25 एकड़ क्षेत्र में बना है, जिस पर 200 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत आई है। पंजाबी सभ्यता एवं देश के प्रति शहीद हुए वीरों की शहादत को याद दिलाते जंग-ए-आजादी स्मारक में 6 गैलरी बनाई गई हंै। प्रत्येक गैलरी में अलग-अलग स्वतंत्रता संग्राम के हीरो की जानकारी विभिन्न तरीकों से दी गई है। एक गैलरी फिल्म हाल के लिए बनाई गई है, जिसमें 15 मिनट की थ्री डी फिल्म दिखाई जाती है। उस फिल्म में आजादी के दौरान हुई लड़ाई के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है। शाम को एलईडी लाइट्स से यहां गूंजती हुईं आवाजें एक अलग तरक का अनुभव देती हं। उन्हें सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि हम सच में उस दौर में चले गए हैं। आजादी के दौरान जितनी लहर चली, उनका नजारा जंग ए आजादी शहीद स्मारक में दिखता है।
नूरजहां की याद में जहांगीर ने बनवाया था नूरमहल
जालंधर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर की दूरी पर नूरमहल स्थित है। कभी लाहौर से दिल्ली जाने का मुख्य मार्ग नूरमहल होकर ही गुजरता था। इतिहासकारों के मुताबिक मल्लिका नूरजहां का यहां जन्म तब हुआ जब उनके पिता मिर्जा ग्यारा मुहम्मद बेग ईरान से दिल्ली जा रहे थे। जब बेग का काफिला यहां आराम फरमा रहा था, तभी उनकी बेगम को प्रसव पीड़ा हुई और नूरजहां का जन्म हुआ। नूरजहां का विवाह मुगल बादशाह जहांगीर से हुआ। बादशाह ने नूरजहां की फरमाइश पर सन् 1613 में विशाल महल तैयार करवाया। इस महल को आज नूरमहल की सराय के नाम से जाना जाता है। कभी सराय के अंदर मस्जिद, रंगमहल, डाक बंगला आदि हुआ करते थे। सराय में 48 कोष्ठ और दो बुर्ज हैं। नूरजहां पक्षियों को बहुत प्यार करती थीं। इसलिए किले में पक्षियों के लिए कोष्ठ बनवाए गए हैं। वहीं किले के मुख्य द्वार पर पालकी बनी है जिस पर दो हाथी सूंड उठाए स्वागत मुद्रा में बने हैं। आसपास के लोग इसको देखने के लिए आते जाते हैं।
महाराजा रणजीत सिंह का किला...फिल्लौर
शाहजहां (1628-1658) के शासनकाल के दौरान फिल्लौर के निकट एक शाही सराय का निर्माण किया गया था और 1809 में इसे महाराजा रणजीत सिंह (1780-1839) के शासन में एक किले के रूप में फिर से बनाया गया था। इसे दीवान मोहकम चंद ने रंजीत सिंह की फ्रांसीसी और इतालवी जनरलों की सहायता से तैयार किया था। 1846 में अलीवाल की लड़ाई में सिखों की हार के बाद अंग्रेजों ने किले पर अधिकार कर लिया। यह किले 1890 तक सेना के नियंत्रण में रहे जब इसे नागरिक अधिकारियों को स्थानांतरित कर दिया गया, जिन्होंने इसे पुलिस प्रशिक्षण केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया। 6 अप्रैल 1973 को पंजाब सरकार ने इसका नाम बदलकर महाराजा रणजीत सिंह किला कर दिया गया। 1981 से इसे महाराजा रणजीत सिंह पंजाब पुलिस अकादमी के रूप में उपयोग किया जाता है। फिल्लौर का किला देश का बेहतरीन पुलिस ट्रेनिंग सेंटर है।