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महारथी नाटक में दिखाया प्रतिभाशाली होने के बावजूद नकारे जाने पर कर्ण का दर्द
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टैगोर थिएटर में सात्विक आर्ट्स दवारानाटक महारथी की प्रस्तुति देते कलाकार।
- फोटो : CHANDIGARH
चंडीगढ़। टैगोर थिएटर में रविवार को सात्विक आर्ट सोसाइटी की ओर से नाटक महारथी का मंचन हुआ। इस नाटक के लेखक विभांशु वैभव हैं। इसका निर्देशन अमित सनौरिया और सरवर अली ने किया है। इस नाटक में 20 कलाकारों ने अपनी भूमिका निभाई है। इसके साथ ही 21 कलाकार बैक स्टेज में रहे। एक घंटा 25 मिनट के इस नाटक की मंच परिकल्पना मनीष परिचारू ने किया है।
नाटक महारथी कर्ण के त्याग और बलिदान की कहानी है। नाटक रणशाला से शुरू होता है। रणशाला में महारथी पर्व के उपलक्ष्य में एक प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन किया गया है। गुरु द्रोण द्वारा विजयी हुए अर्जुन का सम्मान किया जा रहा है। उसी क्षण वहां पर कर्ण का आगमन होता है। कर्ण अर्जुन को प्रतिस्पर्धा के लिए चुनौती देता है।
कर्ण के चुनौती देने पर गुरु द्रोण समझ जाते हैं कि यदि अर्जुन कर्ण के साथ प्रतियोगिता करेगा तो अवश्य हार जाएगा इसलिए वे कर्ण को चुनौती को केवल इसलिए नहीं स्वीकारते क्योंकि वह एक नीच जाति से है और उसके पास कोई राज्य भी नहीं है। यह सुनकर दुर्योधन कर्ण को अपना अंग राज्य दे देता है और उसे अपना मित्र बना लेता है। कर्ण इस बात से बेहद दुखी हैं कि उनकी प्रतिभा को कहीं मौका नहीं दिया जा रहा है। वह अपने शूद्र जीवन से दुखी नहीं हैं, दुख केवल इस बात का है कि प्रतिभाशाली होते हुए भी उन्हें नकारा जा रहा है और उनके बेटे सुदामन को क्या लोग स्वीकार करेंगे।
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एक रात कर्ण एकाएक नींद से जाग जाता है। उसकी पत्नी वृषाली उनकी परेशानी का कारण पूछती है तो कर्ण दुखी होकर अपनी पत्नी से कहते हैं कि बार बार वहीं प्रताड़नाएं उन्हें घेर लेती हैं। उन्हें जीने नहीं देती। कर्ण वृषाली से कहता है कि यदि वह एक शूद्र के घर में जन्मा है तो इसमें उसका क्या दोष है। माता पिता को चुनने के अधिकार विधाता ने किसे दिया है। जन्म के आधार पर गुरु द्रोण ने अधिकारों की बात क्यों की। दरअसल कर्ण उन अधिकारों के न मिलने से दुखी हैं जिसके वह हकदार थे। इसी प्रकार की कई घटनाएं नाटक और कर्ण के पात्र को नए आयाम देती है।
अमित सौनोरिया और सरवर अली ने बताया कि इस नाटक से यह संदेश दिया गया है कि न जाने हमारे समाज में कितने ही एकलव्य और कितने ही कर्ण हैं जो अपनी प्रतिभाएं केवल इसलिए नहीं दिखा पा रहे हैं कि क्योंकि किसी बड़े वंश के अर्जुन को बचाने के लिए हर मोड़ पर द्रोणाचार्य खड़ा है। यहां प्रतिभा नहीं, रुतबा अधिक मायने रखता है। इन्हीं सब सवालों को लिए यह नाटक हमारे समाज में बुराई की जड़ पर वार करता है। महाराथी में दिखाया गया कि कर्ण अपने वजूद को दिखाने के लिए कितने प्रयास किए है। नाटक में बेहतरीन डिजाइन है। समकालीन दृश्यों के साथ कर्ण के जीवन को दिखाया गया है।
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नाटक महारथी कर्ण के त्याग और बलिदान की कहानी है। नाटक रणशाला से शुरू होता है। रणशाला में महारथी पर्व के उपलक्ष्य में एक प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन किया गया है। गुरु द्रोण द्वारा विजयी हुए अर्जुन का सम्मान किया जा रहा है। उसी क्षण वहां पर कर्ण का आगमन होता है। कर्ण अर्जुन को प्रतिस्पर्धा के लिए चुनौती देता है।
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कर्ण के चुनौती देने पर गुरु द्रोण समझ जाते हैं कि यदि अर्जुन कर्ण के साथ प्रतियोगिता करेगा तो अवश्य हार जाएगा इसलिए वे कर्ण को चुनौती को केवल इसलिए नहीं स्वीकारते क्योंकि वह एक नीच जाति से है और उसके पास कोई राज्य भी नहीं है। यह सुनकर दुर्योधन कर्ण को अपना अंग राज्य दे देता है और उसे अपना मित्र बना लेता है। कर्ण इस बात से बेहद दुखी हैं कि उनकी प्रतिभा को कहीं मौका नहीं दिया जा रहा है। वह अपने शूद्र जीवन से दुखी नहीं हैं, दुख केवल इस बात का है कि प्रतिभाशाली होते हुए भी उन्हें नकारा जा रहा है और उनके बेटे सुदामन को क्या लोग स्वीकार करेंगे।
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एक रात कर्ण एकाएक नींद से जाग जाता है। उसकी पत्नी वृषाली उनकी परेशानी का कारण पूछती है तो कर्ण दुखी होकर अपनी पत्नी से कहते हैं कि बार बार वहीं प्रताड़नाएं उन्हें घेर लेती हैं। उन्हें जीने नहीं देती। कर्ण वृषाली से कहता है कि यदि वह एक शूद्र के घर में जन्मा है तो इसमें उसका क्या दोष है। माता पिता को चुनने के अधिकार विधाता ने किसे दिया है। जन्म के आधार पर गुरु द्रोण ने अधिकारों की बात क्यों की। दरअसल कर्ण उन अधिकारों के न मिलने से दुखी हैं जिसके वह हकदार थे। इसी प्रकार की कई घटनाएं नाटक और कर्ण के पात्र को नए आयाम देती है।
अमित सौनोरिया और सरवर अली ने बताया कि इस नाटक से यह संदेश दिया गया है कि न जाने हमारे समाज में कितने ही एकलव्य और कितने ही कर्ण हैं जो अपनी प्रतिभाएं केवल इसलिए नहीं दिखा पा रहे हैं कि क्योंकि किसी बड़े वंश के अर्जुन को बचाने के लिए हर मोड़ पर द्रोणाचार्य खड़ा है। यहां प्रतिभा नहीं, रुतबा अधिक मायने रखता है। इन्हीं सब सवालों को लिए यह नाटक हमारे समाज में बुराई की जड़ पर वार करता है। महाराथी में दिखाया गया कि कर्ण अपने वजूद को दिखाने के लिए कितने प्रयास किए है। नाटक में बेहतरीन डिजाइन है। समकालीन दृश्यों के साथ कर्ण के जीवन को दिखाया गया है।