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जाट आरक्षण: हाइकोर्ट का स्टे हटाने से इंकार, सरकार ने रखा पक्ष
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 05 Jul 2016 05:58 PM IST
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हाईकोर्ट
- फोटो : file photo
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हरियाणा में जाटों समेत छह जातियों को आरक्षण पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की ओर से लगाई गई अंतरिम रोक के मामले में सोमवार को नियमित बेंच के समक्ष सुनवाई शुरू हुई। हालांकि करीब दो घंटे से भी अधिक समय तक चली बहस अधूरी ही रही। अब केस की अगली सुनवाई 7 जुलाई को होगी। इस बीच, सरकार की दलीलें सुनने के बावजूद हाईकोर्ट ने जाट आरक्षण पर लगी रोक को हटाने से इंकार कर दिया।
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जस्टिस एसएस सारों और जस्टिस लिजा गिल की बेंच के समक्ष सोमवार को हरियाणा सरकार की अपील पर सुनवाई शुरू हुई। इससे पहले बेंच ने सरकारी वकील से पूछा कि वह मुख्य केस पर बहस करना चाहते हैं या आरक्षण पर लगी रोक हटाने के बारे में सरकार की अर्जी पर। सरकारी वकील ने कहा कि इस समय राज्य में दाखिलों और भर्ती की प्रक्रिया जारी है, इसलिए वे पहले आरक्षण पर लगी अंतरिम रोक हटाने की अर्जी पर बहस करना चाहते हैं। हरियाणा सरकार ने विभिन्न विभागों की भर्ती और शिक्षण संस्थानों की प्रवेश प्रक्रिया का हवाला देते हुए आरक्षण पर लगी रोक हटाने की अपील की।
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सरकार की तरफ से पेश हुए सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट जगदीप धनखड़ ने अदालत से कहा की सरकार ने विधानसभा में बिल लाकर जाट आरक्षण के लिए कानून बनाया गया है। ऐसे में इसकी कानूनी वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती। उन्होंने हाईकोर्ट से कहा कि आरक्षण पर रोक के आदेशों के चलते हजारों नियुक्तियों के लिए चल रही प्रक्रिया थम गई है। जबकि शिक्षण संस्थानों में चल रही प्रवेश प्रक्रिया भी प्रभावित हुई है। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि वह जाट आरक्षण के आधार पर स्कूल-कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति प्रदान करे।
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हालांकि अदालत ने इस स्वीकृति नहीं दी। इसके साथ ही, आरक्षण के विरोध में दाखिल याचिकाओं का जवाब देते हुए हरियाणा सरकार की तरफ से तमिलनाडु में लागू 69 फीसदी आरक्षण का उदाहरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंदिरा साहनी केस पर दिए फैसले का भी उल्लेख किया। आरक्षण को 50 फीसदी के दायरे में रखने पर हरियाणा सरकार की ओर से दलील दी गई कि सरकार ने पिछड़ा वर्ग के कुल भाग में ही विशेष पिछड़ा वर्ग को आरक्षण की सुविधा प्रदान की है।
हरियाणा सरकार की दलीलों का विरोध करते हुए याची पक्ष ने कहा कि हरियाणा सरकार की ओर से तय आरक्षण की व्यवस्था दबाव में लिया गया फैसला है। इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है। हरियाणा सरकार ने उस केसी गुप्ता आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही नकार चुका है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से अपील की कि हरियाणा सरकार की अर्जी को खारिज करते हुए आरक्षण पर रोक बरकरार रखी जाए।