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जाट आरक्षण पर लटकी तलवार, बिल को हाईकोर्ट में चुनौती
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 31 Mar 2016 09:13 AM IST
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चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय
- फोटो : file photo
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हरियाणा की खट्टर सरकार के जाटों को आरक्षण देने संबंधी विधान सभा में पारित हुए बिल को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।
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याचिका में आरोप लगाया है कि एक जाति विशेष के दबाव में आकर आंदोलन के भय से जल्दबाजी में आरक्षण दे दिया गया। इस आरक्षण के साथ प्रदेश में आरक्षण का आंकड़ा 70 प्रतिशत हो गया है, जो सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का सीधे तौर पर उल्लंघन है।
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अभी यह याचिका दाखिल हुई है और जल्द सुनवाई की संभावना है। सफीदों के वकील शक्ति सिंह ने एडवोकेट सत्यनारायण यादव के माध्यम से याचिका में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1992 में एक फैसले में कहा था कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।
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हरियाणा सरकार ने वर्ष 2014 में भी जाटों समेत अन्य जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षण दिया था और इसे सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग की सिफारिश को आधार बनाते हुए रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा था कि आयोग का सर्वे है कि आर्म्ड फोर्स, सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में जाटों का पुख्ता प्रतिनिधित्व है, ऐसे में उन्हें पिछड़ा नहीं माना जा सकता।
याचिका में कहा है कि अब एक ही दिन में 28 मार्च को विधान सभा में बिल पारित करके जाटों को बीसी सी में शामिल कर लिया गया। हरियाणा में मौजूदा आरक्षण के हिसाब से सरकारी नौकरियों के श्रेणी ए व बी में बीसी ए को 11 प्रतिशत, बीसी बी को 6 प्रतिशत, बीसी सी को 6 प्रतिशत और ईबीपी को 7 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है जबकि तृतीय व चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरियों में बीसी ए को 16 प्रतिशत, बीसी बी को 11 प्रतिशत, बीसी सी को 10 और ईबीपी को 10 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा। इस लिहाज से प्रदेश में आरक्षण सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय आरक्षण फीसदी से कहीं अधिक हो गया है, जो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।
याचिका में आरोप लगाया है कि सरकार ने जल्दबाजी में आरक्षण दिया है। इससे पहले न ही कोई सर्वे करवाया गया, न ही कोई कमेटी गठित की गई और न ही कमिशन के आंकड़े परखे गए। आरोप है कि केवल आंदोलन के भय के कारण एक जाति विशेष के दबाव में आकर यह आरक्षण दिया गया है। इस तर्क के साथ मांग की गई है कि यह बिल रद्द किया जाना चाहिए और मामले की सुनवाई तक बिल पर रोक लगानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था यह आरक्षण सिर्फ उन्ही जातियों को दी जा सकती है जो वास्तव में पिछड़े और शोषित वर्ग से हों वहीं यह भी दलील दी गयी है की सरकार ने बिना कोई सर्वे करवाए ही यह आरक्षण दे दिया है जबकि इंदिरा साहनी के केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह तय किया था की बिना पर्याप्त सर्वे कर किसी भी जाति को आरक्षण नहीं दिया जा सकता।