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हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: एफआईआर देरी से दर्ज होना मुआवजे का दावा खारिज करने का आधार नहीं
Fri, 30 Jun 2023 08:07 AM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Fri, 30 Jun 2023 08:07 AM IST
सार
कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन हादसे के मुआवजे के लिए होने वाली जांच सिविल होती है और इसमें संभावनाओं पर आधारित सबूत ही पर्याप्त होते हैं। यह जांच आपराधिक मामलों की जांच की तरह नहीं होती है जहां पर सबूतों का कड़ी कसौटियों पर खरा उतरना जरूरी होता है।
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : File Photo
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि मोटर वाहन हादसे में जान गंवाने वाले की विधवा का मुआवजे का दावा केवल एफआईआर में देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। मुआवजे के दावे की जांच सिविल कार्यवाही है और संभावनाओं पर आधारित सबूत ही विवादित तथ्यों के प्रमाण के रूप में स्वीकार किए जा सकते हैं।
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याचिका दाखिल करने वाली मीना शर्मा के पति की मोटर वाहन हादसे में मौत हो गई थी। उन्होंने मुआवजे की मांग मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल गुरुग्राम में की थी। याची के पति की मोटर वाहन हादसे में 26 मार्च 2010 को मौत हो गई थी। ट्रिब्यूनल ने एफआईआर में 17 दिन की देरी को आधार बनाते हुए मुआवजे की याचिका को खारिज कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ मीना ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
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कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन हादसे के मुआवजे के लिए होने वाली जांच सिविल होती है और इसमें संभावनाओं पर आधारित सबूत ही पर्याप्त होते हैं। यह जांच आपराधिक मामलों की जांच की तरह नहीं होती है जहां पर सबूतों का कड़ी कसौटियों पर खरा उतरना जरूरी होता है। इस मामले में प्रत्यक्षदर्शी ने देरी से शिकायत दी थी क्योंकि आम तौर पर नागरिक अदालती कार्यवाही में अनावश्यक रूप से उलझने से बचते हैं। ऐसे में एफआईआर में देरी के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज कर ट्रिब्यूनल ने गलती की है। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को रद्द करते हुए अब केस को दोबारा उसी के पास मुआवजा तय करने के लिए भेज दिया है।