पीजीआई में 2004 से पहले एडहॉक पर नियुक्त डॉक्टर जीपीएफ व पुरानी पेंशन स्कीम के हकदार
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पीजीआई में एडहॉक आधार पर 1 जनवरी 2004 से पहले नियुक्त और बाद में रेगुलर हुए डाक्टरों को अब जीपीएफ और पुरानी पेंशन स्कीम का लाभ मिलेगा। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह आदेश कैट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा दाखिल याचिका को खारिज करते हुए जारी किया है। कैट ने पीजीआई के ऐसे डाक्टरों के हक में फैसला सुनाया है जिनकी नियुक्ति नई पेंशन स्कीम आने से पहले एडहॉक आधार पर हुई थी और नियमित स्कीम आने के बाद किया गया था। कैट ने अपने आदेश में कहा था कि स्वीकृत पदों की एवज में इन डाक्टरों को एडहॉक आधार पर नियुक्ति दी गई थी।
इन्हें रेगुलर डाक्टरों की तहर सभी सुविधाएं व लाभ भी दिए गए थे। यह डाक्टर योग्यता मानकों और अनुभव के मानदंडों पर भी खरे उतरते हैं और ऐसे में इन्हें जीपीएफ और पुरानी पेंशन स्कीम के लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता। केंद्र सरकार ने इस फैसले को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए चुनौती दी थी।
नियुक्ति में देरी के लिए पीजीआई दोषी
डाक्टरों की ओर से सीनियर एडवोकेट गुरमिंदर सिंह ने बहस करते हुए कहा कि इन डाक्टरों ने अपनी सेवाएं नियमित तौर पर दी थी और उसके बाद इन्हें रेगुलर किया गया। उन्होंने कहा कि पीजीआई ने असिस्टेंट प्रोफेसर के पद 2003 में निकाले थे, लेकिन मीटिंग होने में देरी के चलते नियुक्तियों की प्रक्रिया लंबी खिंच गई। इसमें डाक्टरों का नहीं बल्कि पीजीआई का दोष है। साथ ही पीजीआई के नियम के अनुसार कान्टीन्यूटी ऑफ सर्विस को भी यदि देखें तो यह डाक्टरों के हक में जाता है। ऐसे में जीपीएफ तथा पुरानी पेंशन स्कीम के लाभ से डाक्टरों को इनकार नहीं किया जा सकता।
एडहॉक नियुक्ति को ही मानें असली तिथि
केंद्र सरकार द्वारा डाक्टरों की दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस एके मित्तल पर आधारित खंडपीठ ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए कैट के फैसले को सही करार दिया। कोर्ट ने कहा कि डाक्टरों की एडहॉक आधार पर नियुक्ति की तिथि को ही उनकी नियुक्ति की तिथि माना जाए और ऐसे में उस समय पुरानी पेंशन स्कीम मौजूद थी। ऐसे में सभी ऐसे डॉक्टर पुरानी पेंशन स्कीम का फायदा पाने के हकदार हैं।